तरुण कौशिक संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर जिले की एक तहसील से उजागर हुआ रिश्वतखोरी का सनसनीखेज मामला अब प्रशासनिक गलियारों में भूचाल बन चुका है। “रिश्वत दो, वरना आवेदन सो” जैसी मानसिकता के साथ काम कर रहे हल्का पटवारी की करतूत जब 31 मार्च 2026 को सर्वव्यापी वेबपोर्टल पर प्रकाशित हुई, तो पूरे जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया।मामले में खुलासा हुआ था कि पांच भाई-बहनों के बीच जमीन के बंटवारे और नामांतरण के लिए पटवारी ने खुलेआम 3 लाख रुपए का ‘रेट’ तय कर दिया था। इतना ही नहीं, उसने कथित तौर पर “ऊपर तक सेटिंग” का दावा करते हुए यहां तक कह दिया था कि “कलेक्टर से शिकायत कर दो, कुछ नहीं होगा”।खबर प्रकाशित होते ही मामला राजधानी तक गूंज उठा। उच्च स्तर पर संज्ञान लिए जाने के बाद यह प्रकरण मुख्य सचिव विकास शील और मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया, जिसके बाद जिला प्रशासन तुरंत हरकत में आया।मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वव्यापी टीम ने पीड़ित किसानों को सीधे कलेक्टर के आदेश पर संबंधित तहसीलदार के समक्ष प्रस्तुत किया। किसानों ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि आवेदन देने के बावजूद उनकी फाइलें जानबूझकर रोकी गईं और काम के एवज में मोटी रकम की मांग की गई। इसके बाद किसानों ने तहसीलदार को को नये सिरे से आवेदन पत्र प्रस्तुत किया है।जिस पर मामले पर तत्काल कार्रवाई करने निर्देश दिए हैं। वहीं कलेक्टर संजय अग्रवाल ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा कि जिले में किसी भी कार्य के लिए रिश्वत देने की आवश्यकता नहीं है। सभी कार्य नियमपूर्वक किए जाएंगे और पीड़ितों को न्याय मिलेगा। उन्होंने संबंधित हल्का पटवारी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के निर्देश भी दिए और भरोसा दिलाया कि दोषियों को किसी भी स्थिति में बख्शा नहीं जाएगा।यह मामला केवल एक पटवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्व तंत्र की उस जमीनी सच्चाई को उजागर करता है, जहां नामांतरण, सीमांकन और बंटवारे जैसे कार्यों में सेवा की जगह सौदेबाजी हावी होती जा रही है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस तरह की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं, लेकिन इस बार मामला सार्वजनिक होने के बाद प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी पड़ी।घटना के बाद किसानों और आम नागरिकों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि यदि इस बार सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो भ्रष्टाचार और अधिक बेलगाम हो जाएगा।अब सबकी नजरें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं। सवाल यह नहीं है कि भ्रष्टाचार हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इस बार दोषियों पर वास्तव में कार्रवाई होगी या मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा।फिलहाल, कलेक्टर संजय अग्रवाल के सख्त तेवर और उच्च स्तर तक पहुंचे इस मामले ने यह उम्मीद जरूर जगा दी है कि अब व्यवस्था में बदलाव संभव है और आने वाले समय में “रिश्वत नहीं, नियम” का पालन सुनिश्चित किया जाएगा। यह किस तहसील कार्यालय का मामला है और कौन पटवारी उसका खुलासा अगले अंक में करेंगे।