संपादक के कलम से…अंधियार के पाछू उजाला: नवगठित बस्तर के जागत आत्मा।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

धरती के कोरा-कोरा मं बसाय प्रकृति के अनुपम सौंदर्य, घना जंगल, बहत नदिया अऊ गहिर सांस्कृतिक परंपरा बर पहिचान बनाय बस्तर, कभू अइसन दौर ले गुजरिस जिहां हरियाली मं डर के छाया छा गे रहिस। जंगल के हर पत्ता जइसने सहम गे रहिस, अऊ चिरई-चुरगुन के मधुर आवाज के जगा गोली के कड़क गूंज सुने ला मिलत रहिस। ओ बखत सिरिफ जमीन नइ, बल्कि मनखे के मन घलो घायल होवत रहिस।ओ दौर मं जिनगी के हर पहलू प्रभावित होइस। गांव के रद्दा सूना पर गीन, लोगन के आवाज दब गे, अऊ विश्वास टूटत चलिस। पढ़ई-लिखई के मंदिर—स्कूल मन—खाली परे रहिन, जिहां कभू लइका मन के किलकारी गूंजत रहिस। अस्पताल तक पहुंच पाना भारी कठिन हो गे रहिस, अऊ बीमारी मं घलो लोगन अपन किस्मत के भरोसा मं छोड़ देत रहिन। बस्तर के आम जनजीवन डर, अनिश्चितता अऊ असुरक्षा के बीच जूझत रहिस।जऊन जंगल कभू जीवन के आधार रहिस—लकड़ी, फल-फूल, जड़ी-बूटी अऊ परंपरा के स्रोत—ओही जंगल आतंक के ठिकाना बन गे रहिस। ये बदलाव सिरिफ भौतिक नइ, बल्कि मानसिक अऊ सामाजिक टूटन के संकेत रहिस। लोगन के भीतर के भरोसा डगमगाय लगिस, अऊ समाज के ताना-बाना कमजोर होवत गीस।फेर इतिहास मं हर अंधियार के बाद उजाला जरूर आवत हे। बस्तर मं घलो ए बदलाव धीरे-धीरे दिखे लगिस। प्रशासन के सटीक योजना, सुरक्षा बल के हिम्मत अऊ सबसे बढ़के—स्थानीय जनता के सहयोग अऊ विश्वास—ए तीनों मिलके बदलाव के रद्दा तय करिन। गांव-गांव मं विश्वास के दीया जलना शुरू होइस, अऊ लोगन धीरे-धीरे डर के साया ले बाहर निकलना शुरू करिन।आज के बस्तर एक नई कहानी लिखत हे। अब लइका मन के हाथ मं किताब हवय, अऊ आंखी मं बड़े-बड़े सपना। स्कूल मन मं फेर ले रौनक आ गे हे, अऊ पढ़ई-लिखई के माहौल मजबूत होत हे। गुरुजी के आवाज अऊ लइका मन के हंसी अब नवा बस्तर के पहचान बनत जात हे।स्वास्थ्य सेवा मं घलो सुधार दिखत हे। अस्पताल मन मं सुविधा बढ़त हे, अऊ गांव तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाय के कोशिश जारी हे। अब लोगन इलाज खातिर शहर भागे के मजबूरी ले धीरे-धीरे मुक्त होत हवंय।आस्था अऊ संस्कृति के धारा घलो फेर ले प्रवाहित होवत हे। दंतेश्वरी मइया के मंदिर मं श्रद्धालु मन के भीड़ उमड़त हे, अऊ देवगुड़ी मन मं पूजा-पाठ, जत्रा अऊ तिहार धूमधाम ले मनाय जात हे। बस्तर के लोकनाचा, लोकगीत अऊ पारंपरिक कला फेर ले जिंदा होवत हवंय—जऊन बस्तर के असली आत्मा आय।इंद्रावती नदी के किनारा मं अब शांति के लहर दिखत हे। नाव फेर ले चलत हे, अऊ मछुवार मन अपन काम मं लगे हवंय। हाट-बाजार मं चहल-पहल बढ़ गे हे, अऊ बस्तर के हस्तशिल्प—जइसन बेलमेटल, बांस कला अऊ लकड़ी के कारीगरी—देश-दुनिया मं अपन पहचान बना रहिन।ए बदलाव सिरिफ बाहरी नइ, बल्कि भीतर ले आय हवय। लोगन के सोच बदलत हे, आत्मविश्वास बढ़त हे अऊ समाज फेर ले एकजुट होवत हे। जऊन बस्तर कभू डर अऊ हिंसा के प्रतीक बन गे रहिस, ओही आज शांति, विकास अऊ उम्मीद के नवा गाथा लिखत हे।कभू जऊन पहाड़ी मैना चुप हो गे रहिस, अब ओकर मधुर सुर फेर ले जंगल मं गूंजत हे। ये आवाज सिरिफ चिरई के नइ, बल्कि बस्तर के पुनर्जागरण के प्रतीक आय।आज बस्तर अपन अतीत के पीरा ले सीख लेके, मजबूती के संग भविष्य के ओर बढ़त हे। ए कहानी संघर्ष के घलो आय, साहस के घलो आय अऊ सबसे बढ़के—विश्वास के जीत के कहानी आय।अंधियार चाहे कतको गहिर काबर नइ होवय, उजाला के एक किरण ओकर ला चीर के निकल जाथे—अऊ बस्तर आज ओही उजाला के जीवंत उदाहरण बन गे हे।


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