सुशासन के दावे खोखले? जनदर्शन फेल, जनता न्याय के लिए दिल्ली दरबार तक मजबूर।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

जनदर्शन और “सुशासन तिहार” जैसे अभियानों के जरिए सरकार भले ही खुद को संवेदनशील और जवाबदेह साबित करने में लगी हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि आम जनता, सामाजिक कार्यकर्ता और नौकरी पेशा लोग स्थानीय स्तर पर निराश होकर सीधे नरेंद्र मोदी, राज्यपाल रमेन डेका, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और न्यायपालिका तक अपनी शिकायतें भेजने को मजबूर हैं।यह स्थिति साफ संकेत देती है कि सरकार द्वारा चलाए जा रहे जनसुनवाई के तंत्र में कहीं न कहीं गहरी खामी है। जब जिले में कलेक्टर, प्रदेश में मंत्री और मुख्यमंत्री तक “जनदर्शन” के नाम पर जनता की समस्याएं सुनने का दावा करते हैं, तो फिर लोगों को सर्वोच्च स्तर तक गुहार लगाने की नौबत क्यों आ रही है?जिलों में लगने वाले जनदर्शन कार्यक्रम अब सवालों के घेरे में हैं। सैकड़ों लोग लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी समस्याएं दर्ज कराते हैं, लेकिन समाधान के नाम पर सिर्फ आश्वासन मिलता है। फाइलें आगे बढ़ती हैं, लेकिन नतीजा अक्सर शून्य ही रहता है। ऐसे में “सुशासन तिहार” जैसे अभियान भी केवल कागजी उपलब्धि बनकर रह जाते हैं।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब एक नागरिक को अपनी बुनियादी समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री, राज्यपाल या राष्ट्रपति तक आवेदन देना पड़ता है, तो यह सीधे-सीधे स्थानीय प्रशासन और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। यह दर्शाता है कि निचले स्तर पर सुनवाई या तो हो नहीं रही, या फिर उसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल सिस्टम की कमजोरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय न होने का परिणाम है। जब तक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक जनदर्शन जैसे कार्यक्रम सिर्फ दिखावा ही बने रहेंगे। जनता की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई और उसकी निगरानी का अभाव इस समस्या को और गहरा बना रहा है।ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी इलाकों तक, हर वर्ग के लोग अपनी उम्मीद लेकर इन मंचों तक पहुंचते हैं। लेकिन बार-बार की अनदेखी और देरी से उनका विश्वास टूट रहा है। यही कारण है कि अब लोग सीधे उच्च स्तर पर अपनी आवाज उठाने को मजबूर हो रहे हैं।यह हालात सरकार के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत हैं। यदि समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो “सुशासन” का दावा केवल नारे तक सीमित रह जाएगा और जनता का भरोसा लगातार कमजोर होता जाएगा।अब वक्त आ गया है कि सरकार केवल योजनाओं का प्रचार करने के बजाय उनकी वास्तविक प्रभावशीलता पर ध्यान दे। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ी कसौटी जनता का विश्वास होता है और जब जनता ही न्याय के लिए दर-दर भटकने लगे, तो यह किसी भी सरकार के लिए गंभीर सवाल खड़ा करता है।


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