विकास नंद/ सर्वव्यापी/
अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर जहां एक ओर श्रमिकों के सम्मान और उनके योगदान को याद किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पिछले वर्षों की कुछ तस्वीरें और परंपराएं इस बार चर्चा से लगभग गायब रहीं। खासकर, पूर्ववर्ती सरकार के दौरान मजदूर दिवस पर ‘बोरे बासी’ खाने की पहल को लेकर सक्रिय रहने वाले कई अधिकारी इस बार सोशल मीडिया पर नजर नहीं आए।
गौरतलब है कि पिछली सरकार के समय ‘बोरे बासी’ को श्रमिक संस्कृति और परंपरा से जोड़ते हुए इसे बढ़ावा दिया गया था। उस दौरान कई प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि उत्साह के साथ इसकी तस्वीरें साझा करते थे, जिससे यह पहल व्यापक चर्चा में रही।
हालांकि, इस वर्ष मजदूर दिवस के मौके पर ऐसी तस्वीरें और पोस्ट कम ही देखने को मिलीं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इस परंपरा को लेकर सन्नाटा सा रहा, जिससे लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
बदलते राजनीतिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं के चलते इस तरह की प्रतीकात्मक गतिविधियों में भी बदलाव देखने को मिलता है। वहीं, कुछ लोग इसे केवल दिखावे की परंपरा बताते हुए कहते हैं कि असली जरूरत मजदूरों के हितों से जुड़े ठोस कार्यों पर ध्यान देने की है।
फिलहाल, मजदूर दिवस पर ‘बोरे बासी’ की यह अनुपस्थिति एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या ऐसी परंपराएं केवल समय और सरकार के साथ बदल जाती हैं, या फिर इन्हें स्थायी रूप से सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।