पत्रकार उपेक्षित क्यों? हजारों संगठन होने के बावजूद जमीनी पत्रकारों को नहीं मिल रही पहचान, सुविधाएं और सम्मान — सरकार और जनसंपर्क विभाग पर गंभीर आरोप।

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कबीरधाम, धनंजय साहू, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में पत्रकारों के अधिकार, सम्मान और सुविधाओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जहां एक ओर राज्य में पत्रकार संगठनों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में जमीनी स्तर पर कार्यरत पत्रकार खुद को उपेक्षित और भेदभाव का शिकार महसूस कर रहे हैं।इसी मुद्दे को लेकर ग्लोबल जर्नलिस्ट एंड मीडिया संघ के प्रदेश महासचिव एवं सर्वव्यापी अखबार व वेबपोर्टल के प्रधान संपादक तरुण कौशिक ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राज्य सरकार और जनसंपर्क विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।तरुण कौशिक ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में बड़े मीडिया संस्थानों और प्रभावशाली लोगों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि ग्रामीण अंचलों में कार्य करने वाले पत्रकार, छोटे समाचार पत्रों के प्रकाशक, मुद्रक, संपादक और संवाददाता पूरी तरह से नजरअंदाज किए जा रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करने वाली भी है।उन्होंने विस्तार से बताया कि प्रदेश के हजारों पत्रकार ऐसे हैं, जिन्हें आज तक न तो सरकारी विज्ञापन मिल पाते हैं और न ही अधिमान्यता कार्ड जारी किए जाते हैं। इसके चलते उनकी पहचान और विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लग जाता है। इसके अलावा, छत्तीसगढ़ मंत्रालय में प्रवेश के लिए नियमित पास नहीं मिलने से पत्रकारों को अपने कर्तव्यों के निर्वहन में भी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।ग्लोबल जर्नलिस्ट एंड मीडिया संघ के प्रदेश महासचिव तरुण कौशिक ने यह भी कहा कि सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी इन पत्रकारों तक नहीं पहुंच पाता, जिससे वे आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर होते जा रहे हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बीमारी या आपातकालीन स्थिति में जब पत्रकार मुख्यमंत्री या संबंधित मंत्रियों को स्वेच्छा अनुदान के लिए आवेदन करते हैं, तब भी उन्हें किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलती। इससे यह स्पष्ट होता है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर संवेदनहीनता व्याप्त है।उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस पूरे मामले की जानकारी होने के बावजूद प्रदेश के अधिकांश पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी मौन धारण किए हुए हैं। जिन संगठनों का दायित्व पत्रकारों के हितों की रक्षा करना है, वे ही इस मुद्दे पर सक्रिय भूमिका निभाने से बचते नजर आ रहे हैं। इससे उपेक्षित पत्रकारों में निराशा और आक्रोश दोनों बढ़ रहे हैं।इसी पृष्ठभूमि में ग्लोबल जर्नलिस्ट एंड मीडिया संघ ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने का निर्णय लिया है। संगठन द्वारा राज्य सरकार को ज्ञापन सौंपकर मांग की गई है कि सभी वर्गों के पत्रकारों को समान अधिकार, सम्मान और सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं। साथ ही अधिमान्यता प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने, छोटे एवं ग्रामीण मीडिया संस्थानों को नियमित विज्ञापन देने, और पत्रकारों के लिए स्वास्थ्य एवं आपात सहायता योजनाएं लागू करने की भी मांग की गई है।संघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि सरकार द्वारा जल्द ही इस दिशा में ठोस और सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो प्रदेशभर के उपेक्षित पत्रकारों को साथ लेकर व्यापक आंदोलन छेड़ा जाएगा।यह मामला अब केवल सुविधाओं का नहीं, बल्कि पत्रकारों के आत्मसम्मान, अस्तित्व और लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी भूमिका के संरक्षण का बन चुका है। आने वाले समय में सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।


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