तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण रखने और सादगी अपनाने की अपील की। प्रधानमंत्री का यह संदेश आर्थिक आत्मनिर्भरता, ऊर्जा बचत और पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना गया। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह अपील सिर्फ आम जनता के लिए है या फिर सत्ता और सिस्टम में बैठे लोगों पर भी लागू होती है?देशभर में प्रधानमंत्री की अपील के बाद कुछ प्रतीकात्मक तस्वीरें जरूर सामने आईं। मध्यप्रदेश में जज साइकिल से पहुंचे, छत्तीसगढ़ के पूर्व सांसद चुन्नीलाल साहू ने साइकिल चलाई, कबीरधाम के पुलिस अधीक्षक धर्मेंद्र सिंह भी कुछ किलोमीटर साइकिल से दफ्तर पहुंचे। सोशल मीडिया में तस्वीरें वायरल हुईं, वाहवाही भी मिली। लेकिन इसके बाद पूरा मामला फिर ठंडे बस्ते में चला गया।अब जनता पूछ रही है कि आखिर राज्यपाल,खुद प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री, आईएएस, आईपीएस और बड़े अधिकारी नियमित रूप से साइकिल या इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग क्यों नहीं करते? क्या पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ आम आदमी की है? क्या पेट्रोल-डीजल बचत का संदेश केवल भाषणों और कैमरों तक सीमित रहेगा?देश के अधिकांश राज्यों में मंत्री और बड़े अफसर आज भी भारी-भरकम वीआईपी काफिलों में चलते हैं। कई बार एक व्यक्ति के साथ दर्जनों गाड़ियां दौड़ती हैं। पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने का संदेश देने वाले सिस्टम के भीतर ही ईंधन की सबसे ज्यादा बर्बादी दिखाई देती है। आम आदमी महंगे पेट्रोल से परेशान है, लेकिन सत्ता के गलियारों में सरकारी तेल पर लग्जरी सफर लगातार जारी है।सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जब जनता से त्याग की अपेक्षा की जाती है, तब सत्ता में बैठे लोग खुद त्याग करने से बचते नजर आते हैं। यदि प्रधानमंत्री की अपील वास्तव में गंभीर है तो फिर एक राष्ट्रीय अभियान चलाया जाना चाहिए, जिसमें मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक, आईएएस और आईपीएस अधिकारी कम से कम एक महीने तक नियमित रूप से साइकिल या इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग करें। बिना वीआईपी तामझाम, बिना सड़क रोककर, बिना दिखावे के आम जनता के बीच निकलें। तभी जनता को लगेगा कि देश में सच्चे अर्थों में बदलाव की शुरुआत हुई है।आज हालात यह हैं कि आम आदमी रोजाना धूप, ट्रैफिक और महंगे ईंधन की मार झेल रहा है। मजदूर साइकिल से काम पर जा रहा है, छात्र पैदल स्कूल-कॉलेज पहुंच रहे हैं, मध्यम वर्ग पेट्रोल की कीमतों से परेशान है, लेकिन नेताओं और अफसरों की जीवनशैली पर इसका कोई असर दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि जनता अब प्रतीकात्मक फोटोशूट और सोशल मीडिया स्टंट को गंभीरता से नहीं ले रही।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में कई नेता और अधिकारी कैमरों के सामने साइकिल चलाते दिखाई देंगे। कुछ मिनट की साइकिल यात्रा होगी, फोटो खिंचेंगे, वीडियो वायरल होंगे और फिर वही लग्जरी गाड़ियों का काफिला शुरू हो जाएगा। जनता अब इस “दिखावटी सादगी” को समझने लगी है।यह मुद्दा केवल साइकिल चलाने का नहीं, बल्कि राजनीतिक ईमानदारी और प्रशासनिक नैतिकता का भी है। यदि सरकार वास्तव में ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है तो उसे सबसे पहले वीआईपी संस्कृति पर नियंत्रण करना होगा। बड़े-बड़े काफिले, अनावश्यक सरकारी वाहन, अत्यधिक सुरक्षा घेरा और फिजूल ईंधन खर्च पर सख्ती करनी होगी।लोगों का कहना है कि यदि देशभर के मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी सप्ताह में सिर्फ दो दिन भी साइकिल या इलेक्ट्रिक वाहन का उपयोग करें, तो इससे न केवल ईंधन की बचत होगी बल्कि जनता में भी सकारात्मक संदेश जाएगा। लेकिन अभी तक ऐसा कोई ठोस निर्देश या नीति दिखाई नहीं दे रही।जनता का सीधा सवाल है कि क्या सादगी सिर्फ भाषणों के लिए है? क्या त्याग केवल आम आदमी करेगा? क्या वीआईपी संस्कृति कभी खत्म होगी? और क्या प्रधानमंत्री की अपील सत्ता के गलियारों तक पहुंचेगी या केवल जनता तक ही सीमित रह जाएगी?देश अब भाषण नहीं, उदाहरण देखना चाहता है। क्योंकि असली परिवर्तन कैमरे के सामने नहीं, व्यवहार में दिखाई देता है।