तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में वर्ष 2003 की पीएससी भर्ती प्रक्रिया पर उठे सवाल आज भी प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। यह केवल एक भर्ती विवाद नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं के विश्वास का प्रश्न है , जिन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं को अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर पारदर्शी मानकर तैयारी की थी। दो दशक बाद भी जब यह मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया है, तब यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि आखिर न्याय व्यवस्था की अंतिम उम्मीद मानी जाने वाली सर्वोच्च अदालत में अब इस मामले को “लोक अदालत” के माध्यम से सुलझाने की कोशिश क्यों हो रही है ?इस पूरे प्रकरण में सबसे चर्चित नाम उम्मीदवार वर्षा डोंगरे का रहा, जिन्होंने अकेले दम पर कथित अनियमितताओं के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। कहा जाता है कि जब अधिकांश लोग सिस्टम के दबाव, प्रभाव और लंबी कानूनी प्रक्रिया से पीछे हट गए, तब वर्षा डोंगरे लगातार न्यायालय के दरवाजे खटखटाती रहीं। अंततः छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में उन्हें राहत भी मिली और भर्ती प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हुए। लेकिन इसके बाद जिन उम्मीदवारों की नियुक्तियां प्रभावित हो सकती थीं, उन्होंने अपनी नौकरियां बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख कर लिया।यहीं से यह मामला केवल भर्ती विवाद न रहकर सत्ता, प्रशासन और न्याय व्यवस्था के बीच जटिल संघर्ष का प्रतीक बन गया। क्योंकि जिन अधिकारियों पर कभी भर्ती प्रक्रिया में लाभ लेने के आरोप लगे, उन्हीं में से कुछ आज भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस अवार्ड प्राप्त कर चुके हैं और छत्तीसगढ़ में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों, यहां तक कि कलेक्टर जैसे संवेदनशील पदों पर कार्यरत बताए जाते हैं। ऐसे में आम जनता के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यदि भर्ती प्रक्रिया पर न्यायालय ने सवाल उठाए थे, तो फिर उन्हीं नियुक्तियों के आधार पर प्रशासनिक ऊंचाइयों तक पहुंचने वालों की जवाबदेही कौन तय करेगा?सबसे बड़ा प्रश्न अब यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस प्रकरण को लोक अदालत में सुनवाई या समाधान की दिशा में ले जाना क्या वास्तव में न्यायसंगत माना जा सकता है? लोक अदालत सामान्यतः उन मामलों के लिए उपयुक्त मानी जाती है जहां दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाद समाप्त करना चाहते हों। लेकिन क्या एक ऐसी भर्ती प्रक्रिया, जिस पर भ्रष्टाचार, पक्षपात और अनियमितता के आरोप लगे हों, उसे भी समझौते की श्रेणी में रखा जा सकता है? क्या प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता का प्रश्न केवल “समझौते” से समाप्त हो जाना चाहिए?कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता साबित होती है, तो उसका प्रभाव केवल कुछ उम्मीदवारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। ऐसे मामलों में अदालतों से अपेक्षा होती है कि वे स्पष्ट और कठोर संदेश दें ताकि भविष्य में कोई भी संस्था युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का साहस न कर सके। लेकिन यदि इतने बड़े मामले का समाधान समझौता आधारित प्रक्रिया की ओर बढ़ता दिखे, तो इससे यह संदेश भी जा सकता है कि प्रभावशाली लोग समय बीतने के बाद अपने पद और शक्ति के दम पर विवादों को “व्यवस्थित” करवा सकते हैं।यह भी कम गंभीर तथ्य नहीं है कि इस भर्ती विवाद को लगभग दो दशक बीत चुके हैं। इस दौरान कई पीढ़ियां प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर चुकी हैं। युवाओं के बीच पहले ही यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाएं पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हैं। पेपर लीक, भर्ती घोटाले और चयन विवादों ने देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं की साख को चोट पहुंचाई है। ऐसे समय में यदि छत्तीसगढ़ के इस चर्चित पीएससी मामले में भी अंतिम निष्कर्ष स्पष्ट न्यायिक निर्णय के बजाय समझौता आधारित प्रक्रिया से निकलता है, तो यह युवाओं के विश्वास पर और बड़ा आघात साबित हो सकता है।सवाल केवल यह नहीं है कि कुछ अधिकारियों की नौकरी बचेगी या जाएगी। सवाल यह है कि क्या मेहनत से पढ़ने वाले युवाओं को यह भरोसा मिलेगा कि व्यवस्था अंततः ईमानदार अभ्यर्थियों के साथ खड़ी होती है? क्या यह संदेश जाएगा कि देर भले हो, लेकिन न्याय मिलेगा? या फिर यह धारणा और मजबूत होगी कि प्रभावशाली पदों तक पहुंचने के बाद हर विवाद को समय के साथ दबाया जा सकता है?आज जरूरत केवल कानूनी समाधान की नहीं, बल्कि नैतिक स्पष्टता की भी है। यदि भर्ती प्रक्रिया में वास्तव में अनियमितता हुई थी, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। और यदि आरोप गलत थे, तो भी पूरे मामले पर पारदर्शी अंतिम निर्णय आना चाहिए ताकि वर्षों से चले आ रहे संदेह समाप्त हो सकें। लोकतंत्र में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए।छत्तीसगढ़ का 2003 पीएससी मामला अब केवल एक पुरानी भर्ती का विवाद नहीं रह गया है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा बन चुका है, जो युवाओं से ईमानदारी की उम्मीद करती है। अब देखना यह होगा कि देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले में ऐसा निर्णय देती है जो आने वाली पीढ़ियों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मजबूत करे, या फिर यह मामला भी उन विवादों की सूची में शामिल हो जाएगा जिनमें समय के साथ सच और जवाबदेही दोनों धुंधले पड़ जाएंगे..!