तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक ऐसे वरिष्ठ अफसर की पदस्थापना को लेकर खासी कानाफूसी है, जिसका अतीत कभी भ्रष्टाचार, जमीन घोटाले, अवैध प्लाटिंग और पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोपों से घिरा रहा था।सरकारी दफ्तरों के बंद कमरों से लेकर चाय चौपाल तक एक ही सवाल गूंज रहा है — “क्या सिस्टम में सब कुछ इतना आसान है कि सजा काटने के बाद भी सत्ता और प्रशासन की कुर्सियां वापस मिल जाती हैं?”बताया जाता है कि यह वही अधिकारी है, जिस पर एक समय अवैध प्लाटिंग के मामले में कार्रवाई करते हुए भारी जुर्माना लगाया गया था, लेकिन बाद में सरकारी फाइलों की नोटशीट बदलकर जुर्माने की राशि को बेहद कम कर दिया गया। आरोप यह भी लगे कि जमीन कारोबारियों को राहत पहुंचाने के लिए पद का इस्तेमाल किया गया।मामला इतना बढ़ा कि आर्थिक अपराध अन्वेषण एजेंसी तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। जांच हुई, गिरफ्तारी हुई और फिर विशेष अदालत ने भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में कठोर सजा भी सुनाई। उस समय यह मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना था, क्योंकि एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी को जेल तक जाना पड़ा और नौकरी भी चली गई थी।हालांकि बाद में उच्च न्यायालय से राहत मिलने के बाद कहानी ने नया मोड़ ले लिया। कानूनी तौर पर राहत मिलने के बाद वही अफसर अब फिर से प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पदों में दिखाई दे रहा है। लेकिन जनता और प्रशासनिक हलकों में यह सवाल अब भी तैर रहा है कि —“क्या केवल कानूनी राहत से नैतिक जिम्मेदारी भी समाप्त हो जाती है?”सूत्रों का कहना है कि जिस जिले में इस अफसर की तैनाती हुई है, वहां पुराने जमीन मामलों और राजस्व फाइलों को लेकर दबे स्वर में चर्चाएं फिर तेज हो गई हैं। कई लोग इसे सिस्टम की मजबूरी बता रहे हैं तो कई इसे “प्रशासनिक पुनर्वास” का नया मॉडल कह रहे हैं।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब छोटे कर्मचारी मामूली आरोपों में वर्षों तक निलंबन झेलते रहते हैं, तब बड़े अफसरों के लिए नियम इतने लचीले कैसे हो जाते हैं?क्या व्यवस्था में पद और पहुंच ही सबसे बड़ा कवच बन चुकी है?फिलहाल सरकार और विभागीय स्तर पर सब कुछ सामान्य दिखाने की कोशिश जरूर हो रही है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इस अफसर की वापसी ने एक बार फिर प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिकता पर गंभीर बहस खड़ी कर दी है। वहीं इस अफसर का वर्तमान सत्ता में काबिज एक मंत्री से भी पूर्व कार्यकाल में बहसबाजी और मारपीट की घटना भी हो चुकी है।कहानी किसी एक अफसर की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जहां फाइलें बदलती हैं, फैसले बदलते हैं… और समय के साथ चेहरे भी “क्लीन चिट” में बदल जाते हैं।