तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में इन दिनों “सुशासन तिहार” का शोर है। सरकार दावा कर रही है कि जनता की समस्याओं का समाधान गांव-गांव जाकर किया जा रहा है, अधिकारी जनता के बीच बैठ रहे हैं, योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में यही सुशासन है? क्या मंचों, भाषणों, वीडियो शूट और सोशल मीडिया प्रचार से ही सुशासन स्थापित हो जाता है?गरियाबंद से सामने आई तस्वीर ने पूरे “सुशासन तिहार” की परतें खोल दी हैं। प्रधानमंत्री आवास के लिए एक ग्रामीण अधिकारी के पैरों में गिरने को मजबूर हो जाता है। यह दृश्य केवल एक व्यक्ति की बेबसी नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की असफलता का प्रतीक है। जब एक गरीब नागरिक को अपने अधिकार के लिए किसी अधिकारी के सामने जमीन पर गिरना पड़े, तब समझ लेना चाहिए कि शासन नहीं, व्यवस्था का अहंकार चल रहा है।सरकार कह रही है कि जनता की समस्याओं का समाधान किया जा रहा है। लेकिन यदि समाधान सचमुच हो रहा होता, तो कोई ग्रामीण सार्वजनिक कार्यक्रम में इस हद तक अपमानित क्यों होता? आखिर वह कौन सी पीड़ा रही होगी जिसने उसे अपनी गरिमा छोड़कर अधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाने पर मजबूर कर दिया? यह तस्वीर केवल एक वायरल वीडियो नहीं है, यह छत्तीसगढ़ के गांवों में पनप रही प्रशासनिक असंवेदनशीलता का जीवंत दस्तावेज है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सरकार को यह समझना होगा कि सुशासन केवल सरकारी बैनर और मीडिया मैनेजमेंट से नहीं आता। सुशासन का मतलब है — आम आदमी को सम्मान मिले, उसे अपने अधिकार के लिए हाथ न जोड़ना पड़े, योजनाओं के लिए चक्कर न काटने पड़ें और न ही किसी अधिकारी के सामने गिरना पड़े। यदि गरीब को प्रधानमंत्री आवास जैसी मूलभूत योजना के लिए भी इस तरह अपमानित होना पड़ रहा है, तो फिर सरकार के सारे दावे खोखले नजर आते हैं।आज “सुशासन तिहार” कई जगहों पर जनसुनवाई कम और सरकारी इवेंट ज्यादा दिखाई देने लगा है। अधिकारी कैमरों के सामने सक्रिय दिखते हैं, लेकिन वास्तविक समस्याएं फाइलों और आश्वासनों में दब जाती हैं। जनता की शिकायतों का त्वरित समाधान करने के बजाय उन्हें अगले शिविर, अगले आवेदन और अगले आदेश का इंतजार कराया जाता है। यही कारण है कि लोगों का भरोसा व्यवस्था से लगातार कमजोर होता जा रहा है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रशासन अब संवेदनशील कम और प्रदर्शनकारी ज्यादा होता जा रहा है। जनता की तकलीफें अब “कंटेंट” बन रही हैं। जहां एक ओर ग्रामीण अपने जीवन की मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकारी मशीनरी इन आयोजनों को प्रचार अभियान में बदलने में लगी है। यह लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ है।विष्णु देव साय सरकार को यह भी समझना होगा कि भाजपा ने जनता से “सुशासन” के नाम पर विश्वास मांगा था। यदि उसी शासनकाल में गरीब को सम्मान नहीं मिल रहा, योजनाओं का लाभ पाने के लिए दया मांगनी पड़ रही है और अधिकारी जनता को बराबरी का नागरिक नहीं बल्कि याचक समझ रहे हैं, तो यह राजनीतिक रूप से भी गंभीर संकेत है।सवाल केवल एक घटना का नहीं है। सवाल उस मानसिकता का है जिसमें जनता को अधिकार नहीं, एहसान दिया जाता है। जब तक यह सोच नहीं बदलेगी, तब तक कोई भी “सुशासन तिहार” केवल सरकारी औपचारिकता बनकर रह जाएगा।आज जरूरत बड़े-बड़े मंचों और नारों की नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन की है। जरूरत इस बात की है कि गरीब को उसकी गरिमा लौटाई जाए। क्योंकि जिस राज्य में नागरिक को अपने घर के लिए अधिकारी के पैरों में गिरना पड़े, वहां सुशासन नहीं, व्यवस्था की विफलता दिखाई देती है।