जनता को साइकिल और संयम का पाठ, खुद पांच देशों की उड़ान! ईंधन बचत की नसीहत के बीच प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर उठे सवाल, विपक्ष और जनता पूछ रही—क्या नियम सिर्फ आम लोगों के लिए हैं?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

देश में महंगाई, पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों और ईंधन बचत को लेकर लगातार आम जनता को सीख देने वाली केंद्र सरकार अब खुद सवालों के घेरे में आ गई है। हाल ही में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने, अनावश्यक यात्रा से बचने और यहां तक कि हवाई यात्राओं को कम करने की अपील की थी। लेकिन प्रधानमंत्री की इस अपील के कुछ ही दिनों बाद उनका पांच देशों की विदेश यात्रा पर निकल जाना अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का बड़ा मुद्दा बन चुका है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब देश की आम जनता महंगे पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर और रोजमर्रा की बढ़ती लागत से जूझ रही है, तब सरकार के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा लगातार विदेशी दौरों पर जाना जनता के बीच विरोधाभासी संदेश देता है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या ईंधन बचाने की जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों की है? क्या सरकारी तंत्र और सत्ताधारी नेतृत्व इस त्याग से बाहर हैं?विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि एक तरफ देश में आम आदमी को साइकिल चलाने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और यात्रा सीमित करने की सलाह दी जाती है, वहीं दूसरी ओर वीआईपी संस्कृति और सरकारी खर्चों में कोई कटौती दिखाई नहीं देती। विपक्ष का आरोप है कि सरकार की कथनी और करनी में भारी अंतर साफ नजर आ रहा है।सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का भी मानना है कि यदि सरकार वास्तव में ईंधन बचत और पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है, तो इसकी शुरुआत सत्ता के शीर्ष स्तर से दिखाई देनी चाहिए। जनता को नसीहत देने से पहले सरकार को खुद उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। केवल भाषणों और अपीलों से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता।देश के कई हिस्सों में सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से वायरल हो रहा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि जब आम नागरिकों से “कम यात्रा” और “ईंधन बचत” की अपील की जा रही है, तब सरकारी विमान, बड़े-बड़े काफिले और विदेश यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च क्यों किए जा रहे हैं? जनता के एक वर्ग का कहना है कि यह दोहरा मापदंड लोकतंत्र में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।राजनीतिक जानकारों के अनुसार, आने वाले समय में यह मुद्दा विपक्ष के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है। खासकर तब, जब देश आर्थिक चुनौतियों, बेरोजगारी और महंगाई जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा हो। अब देखने वाली बात होगी कि केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय इस बढ़ते विवाद पर क्या सफाई देते हैं।


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