तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
देश में बढ़ती महंगाई के बीच पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों को लेकर आम जनता की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। हाल के दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे परिवहन लागत बढ़ने के साथ-साथ दैनिक उपयोग की वस्तुओं के दामों पर भी असर पड़ने लगा है। रिपोर्टों के अनुसार मई महीने में पेट्रोल और डीजल के दामों में चार बार बढ़ोतरी हुई है, जिससे आम उपभोक्ताओं, किसानों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार महंगाई नियंत्रण के बजाय पेट्रोल, डीजल और गैस की बढ़ती कीमतों को लेकर गंभीर नहीं दिख रही है। उनका कहना है कि ईंधन की कीमतों में हर बढ़ोतरी का सीधा असर खाद्य पदार्थों, परिवहन और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है, जिससे आम परिवारों का मासिक बजट बिगड़ रहा है।दूसरी ओर केंद्र सरकार का तर्क है कि वैश्विक परिस्थितियों, विशेषकर पश्चिम एशिया में जारी संकट और कच्चे तेल की आपूर्ति पर पड़े प्रभाव के कारण ईंधन क्षेत्र पर दबाव बढ़ा है। वित्त मंत्री ने भी हाल ही में कहा कि सरकार को ईंधन, खाद और विदेशी मुद्रा जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है तथा करों में बड़ी कटौती से सरकारी राजस्व पर भारी असर पड़ सकता है। रसोई गैस के क्षेत्र में भी दबाव बढ़ने की खबरें सामने आई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतों में वृद्धि के कारण तेल कंपनियों की लागत बढ़ी है, जिसका असर भविष्य में उपभोक्ताओं पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईंधन और गैस की कीमतों में लगातार वृद्धि जारी रही तो महंगाई पर नियंत्रण पाना और कठिन हो सकता है। ऐसे में आम जनता की नजर सरकार की उन नीतियों पर टिकी है, जिनसे बढ़ती कीमतों के बीच राहत मिल सके और घरेलू बजट पर पड़ रहा दबाव कम हो सके।