तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी
एक ओर भीषण गर्मी अपने चरम पर है, दूसरी ओर शहर के सबसे व्यस्त मुक्तिधामों में शामिल सरकंडा स्थित पंडित देवकीनंदन मुक्तिधाम में वर्षों से पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा का अभाव बना हुआ था। यहां प्रतिदिन सुबह से शाम तक लगभग 4 से 6 शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है, जिसमें मृतक के परिजन, रिश्तेदार और समाज के सैकड़ों लोग शामिल होते हैं। लेकिन दुख की इस घड़ी में शामिल होने वाले लोगों को पीने के पानी तक के लिए भटकना पड़ रहा था।स्थिति इतनी गंभीर थी कि गर्मी के बीच अंतिम संस्कार में पहुंचे लोगों को प्यास बुझाने के लिए इधर-उधर तलाश करनी पड़ती थी। बताया जा रहा है कि मुक्तिधाम में वर्ष 2018 में एक वाटर कूलर लगाया गया था, लेकिन वह लंबे समय से खराब होकर बंद पड़ा था। आश्चर्यजनक बात यह है कि नगर निगम और समाजसेवी संगठनों का ध्यान भी इस ओर नहीं गया, जबकि यह स्थान शहर के सबसे अधिक उपयोग में आने वाले मुक्तिधामों में से एक माना जाता है।मुक्तिधाम में व्यवस्थाओं की इस अनदेखी ने प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस स्थान पर रोजाना लोगों की अंतिम विदाई होती हो, वहां पेयजल जैसी आवश्यक सुविधा का वर्षों तक बंद रहना व्यवस्था की गंभीर लापरवाही माना जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार इस समस्या को लेकर चर्चा हुई, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकल पाया।इसी बीच 27 मई 2026 को एक अंतिम संस्कार के दौरान वहां पहुंचे ग्राम पेण्डरी कानन निवासी प्रतिष्ठित व्यक्ति लक्ष्मी प्रसाद कौशिक गुरुजी और उनके पुत्र अधिवक्ता समाकल कौशिक ने मुक्तिधाम की बदहाल स्थिति को करीब से देखा। भीषण गर्मी में लोगों को पानी के लिए परेशान होते देखकर उन्होंने तत्काल मानवीय पहल करते हुए अपने पिता एवं स्वर्गीय दादा स्व. श्री साधुराम कौशिक की स्मृति में एक नए वाटर कूलर की व्यवस्था करवा दी।समाज के लोगों ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि जहां सरकारी व्यवस्था मौन दिखाई दी, वहां निजी स्तर पर की गई यह संवेदनशील पहल लोगों के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आई है। अंतिम संस्कार जैसे दुखद अवसरों पर आने वाले लोगों के लिए ठंडे पानी की उपलब्धता न केवल सुविधा है, बल्कि मानवीय संवेदना का प्रतीक भी है।स्थानीय नागरिकों ने अब मांग की है कि नगर निगम और संबंधित प्रशासन मुक्तिधामों की व्यवस्थाओं की नियमित मॉनिटरिंग करे। केवल अंतिम संस्कार की भूमि उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वहां पेयजल, शेड, बैठने की व्यवस्था, स्वच्छता और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का सुचारू संचालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।लोगों का कहना है कि शहर के मुक्तिधाम केवल शोक स्थलों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे समाज की संवेदनशीलता और प्रशासनिक जवाबदेही का भी आईना होते हैं। सरकंडा मुक्तिधाम की यह घटना एक ओर सरकारी उपेक्षा को उजागर करती है, तो दूसरी ओर यह भी दिखाती है कि समाज में आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं जो बिना प्रचार-प्रसार के मानवता के लिए आगे आते हैं।