वाराणसी, प्रिया पाण्डेय, ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
हाल के दिनों में एक पत्रकार और कुछ लोकप्रिय यूट्यूब शिक्षकों के बीच छिड़ा विवाद चर्चा का विषय बना हुआ है। एक पत्रकार द्वारा यूट्यूब पर पढ़ाने वाले कुछ शिक्षकों, विशेष रूप से खान सर और अभिनव शर्मा जैसे चर्चित नामों पर की गई टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। स्थिति ऐसी बन गई कि अनेक यूट्यूब शिक्षक एकजुट होकर पत्रकार के बयान का विरोध करने लगे और अपने-अपने मंचों से प्रतिक्रिया देने लगे। परिणामस्वरूप यह विवाद अब केवल एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर पत्रकारिता और ऑनलाइन शिक्षा के बीच वैचारिक टकराव के रूप में देखा जाने लगा है।पत्रकार का तर्क है कि कुछ ऑनलाइन शिक्षक विद्यार्थियों को केवल शिक्षा ही नहीं दे रहे, बल्कि उन्हें ऐसे मुद्दों की ओर भी प्रभावित कर रहे हैं जो शिक्षा के मूल उद्देश्य से अलग हैं। वहीं दूसरी ओर शिक्षकों और उनके समर्थकों का कहना है कि विद्यार्थियों को उनके अधिकारों, सामाजिक परिस्थितियों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूक करना भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित होनी चाहिए या फिर समाज और व्यवस्था के प्रति जागरूक नागरिक तैयार करना भी उसका उद्देश्य होना चाहिए।एक शिक्षक की भूमिका केवल पुस्तक ज्ञान देने तक सीमित नहीं होती। वह विद्यार्थियों को सही और गलत में अंतर करना सिखाता है, उन्हें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाता है तथा समाज में सक्रिय और जिम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित करने का प्रयास करता है। यदि विद्यार्थी अपने अधिकारों, अवसरों और चुनौतियों को समझेंगे ही नहीं, तो वे अपने भविष्य और समाज के प्रति जागरूक कैसे बन पाएँगे? इसलिए शिक्षा का दायरा केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित नहीं माना जा सकता।दूसरी ओर पत्रकारिता की भी लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका है। पत्रकार का दायित्व सत्ता से सवाल पूछना, जनहित के मुद्दों को उठाना और समाज को सही जानकारी उपलब्ध कराना होता है। पत्रकारिता का उद्देश्य किसी राजनीतिक दल, व्यक्ति या संस्था का पक्ष लेना नहीं, बल्कि जनता के हितों की रक्षा करना और जवाबदेही सुनिश्चित करना है। यही कारण है कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है।दुर्भाग्यवश आज भारतीय मीडिया की स्थिति को लेकर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार और पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे लाखों युवाओं और नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन कई बार मुख्यधारा की बहस इन विषयों से भटकती हुई दिखाई देती है। उदाहरण के लिए जब प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक जैसी घटनाएँ सामने आती हैं, तब युवाओं की पहली अपेक्षा होती है कि मीडिया इस विषय की गहराई से पड़ताल करे, जिम्मेदार लोगों से सवाल पूछे और व्यवस्था की कमियों को उजागर करे। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि ऐसे मुद्दे अपेक्षित स्थान नहीं प्राप्त कर पाते।इसके विपरीत कई बार राजनीतिक व्यक्तित्वों की व्यक्तिगत मुलाकातें, सोशल मीडिया ट्रेंड या हल्के-फुल्के विषय लंबे समय तक चर्चा का केंद्र बने रहते हैं। इससे आम नागरिकों, विशेषकर युवाओं के बीच यह धारणा बनती है कि मीडिया उनकी वास्तविक समस्याओं से दूर होती जा रही है। यही कारण है कि आज बड़ी संख्या में लोग वैकल्पिक मीडिया, स्वतंत्र पत्रकारों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।यह भी सच है कि सोशल मीडिया और यूट्यूब ने सूचना और अभिव्यक्ति के नए अवसर प्रदान किए हैं। आज अनेक युवा पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर ऐसे विषयों पर चर्चा कर रहे हैं जिन पर मुख्यधारा की मीडिया पर्याप्त ध्यान नहीं देती। इन नए मंचों ने जनसरोकार के मुद्दों को उठाने का एक वैकल्पिक रास्ता तैयार किया है। हालाँकि इसके साथ ही तथ्यपरकता, निष्पक्षता और जिम्मेदारी बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है।वर्तमान विवाद से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आता है—क्या हम व्यक्ति-केंद्रित बहसों में उलझकर उन वास्तविक मुद्दों को भूल रहे हैं जो देश के करोड़ों युवाओं और नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं? आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षक अपने दायित्वों का निर्वहन ईमानदारी से करें, पत्रकार निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ जनहित के प्रश्न उठाएँ तथा समाज भी व्यक्तियों के बजाय मुद्दों पर चर्चा करने की संस्कृति को बढ़ावा दे।लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब शिक्षा और पत्रकारिता दोनों अपने मूल उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहें। विद्यार्थियों का भविष्य, युवाओं का रोजगार, शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे विषय ही राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में होने चाहिए। यदि बहस का केंद्र यही मुद्दे बनेंगे, तभी समाज और लोकतंत्र दोनों सशक्त हो सकेंगे।