ओएसडी राज पर उठते सवाल: सत्ता के गलियारों में बढ़ती बेचैनी।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्रियों के विशेष सहायकों (ओएसडी) पर तबादलों में हस्तक्षेप, सिफारिशी संस्कृति को बढ़ावा देने और कथित अवैध वसूली के आरोपों ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में नई बहस छेड़ दी है। सत्ता परिवर्तन के बाद जनता ने जिस पारदर्शी और जवाबदेह शासन की अपेक्षा की थी, उसके विपरीत अब विभिन्न विभागों से यह शिकायतें सामने आ रही हैं कि कई स्थानों पर अधिकारियों और कर्मचारियों के तबादलों में नियमों से अधिक प्रभावशाली व्यक्तियों की भूमिका चर्चा का विषय बन रही है। इन आरोपों के केंद्र में कुछ मंत्रियों के ओएसडी और उनके आसपास सक्रिय कथित नेटवर्क बताए जा रहे हैं।प्रदेश में स्थानांतरण नीति हमेशा से संवेदनशील विषय रही है। किसी भी कर्मचारी या अधिकारी के लिए तबादला केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि उसके पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन से जुड़ा मुद्दा होता है। ऐसे में यदि तबादला प्रक्रिया में पारदर्शिता के स्थान पर सिफारिश, पहुंच और आर्थिक लेन-देन की चर्चाएं होने लगें तो शासन की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्नचिह्न खड़ा होता है। यही कारण है कि हाल के दिनों में विभिन्न कर्मचारी संगठनों और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हुई है कि कुछ विभागों में तबादलों को लेकर असामान्य गतिविधियां दिखाई दे रही हैं।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओएसडी का मूल कार्य मंत्री और विभाग के बीच समन्वय स्थापित करना, जनप्रतिनिधियों तथा आम नागरिकों की समस्याओं को व्यवस्थित रूप से शासन तक पहुंचाना और प्रशासनिक कार्यों को सुचारू बनाना होता है। लेकिन जब यही पद शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित होने लगे और विभागीय निर्णयों पर अनावश्यक प्रभाव की शिकायतें सामने आने लगें, तब स्थिति चिंताजनक हो जाती है। शासन व्यवस्था में जवाबदेही का सिद्धांत कहता है कि निर्णय लेने का अधिकार अधिकृत अधिकारियों और मंत्रियों के पास होना चाहिए, न कि किसी अनौपचारिक शक्ति संरचना के पास।विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लगातार उठाने लगे हैं। उनका आरोप है कि यदि सरकार वास्तव में सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के प्रति गंभीर है तो तबादला प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच करानी चाहिए तथा यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन आधारों पर स्थानांतरण किए जा रहे हैं। दूसरी ओर सत्ता पक्ष का तर्क है कि आरोप राजनीतिक प्रेरित हैं और बिना ठोस प्रमाण के किसी व्यक्ति या पदाधिकारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि जब आरोप लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनने लगें तो सरकार के लिए केवल खंडन पर्याप्त नहीं होता, बल्कि पारदर्शिता के माध्यम से जनता का विश्वास भी अर्जित करना पड़ता है।प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि छत्तीसगढ़ जैसे विकासशील राज्य में नौकरशाही की निष्पक्षता और स्थिरता अत्यंत आवश्यक है। यदि अधिकारियों को यह महसूस होने लगे कि उनकी पदस्थापना और तबादले प्रशासनिक आवश्यकता के बजाय बाहरी प्रभावों से निर्धारित हो रहे हैं, तो इसका असर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और जनता को मिलने वाली सेवाओं पर भी पड़ सकता है। इससे कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित होता है और शासन की कार्यकुशलता कमजोर पड़ती है।प्रदेश में पहले भी विभिन्न सरकारों के कार्यकाल के दौरान ओएसडी और राजनीतिक सहायकों की भूमिका को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। इसलिए वर्तमान विवाद को केवल किसी एक व्यक्ति या विभाग तक सीमित नहीं माना जा सकता। यह एक व्यापक प्रशासनिक प्रश्न है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सलाहकार और विशेष सहायकों की भूमिका की सीमा क्या होनी चाहिए तथा उनकी जवाबदेही कैसे सुनिश्चित की जाए। यदि इस दिशा में स्पष्ट व्यवस्था नहीं बनाई गई तो भविष्य में भी ऐसे आरोप बार-बार उभरते रहेंगे।आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार स्थानांतरण प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और सार्वजनिक मानकों पर आधारित बनाए। साथ ही यदि किसी ओएसडी, कर्मचारी या अधिकारी के विरुद्ध अवैध वसूली अथवा अनुचित हस्तक्षेप की शिकायत प्राप्त होती है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। सुशासन केवल योजनाओं और घोषणाओं से स्थापित नहीं होता, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही से उसकी वास्तविक पहचान बनती है।छत्तीसगढ़ की जनता अब यह जानना चाहती है कि मंत्रियों के विशेष सहायकों पर लग रहे आरोप केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हैं या फिर प्रशासनिक व्यवस्था में किसी गहरी समस्या के संकेत। आने वाले समय में सरकार की कार्रवाई ही इस प्रश्न का उत्तर देगी और यह भी तय करेगी कि सुशासन के दावे कितने मजबूत हैं तथा सत्ता के गलियारों में सक्रिय अनौपचारिक शक्ति केंद्रों पर कितना नियंत्रण है।


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