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ओएसडी बदलते रहे, लेकिन मंत्री पर कार्रवाई कब?

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार में एक बार फिर ट्रांसफर और पदस्थापना को लेकर उठे विवादों ने शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के मंत्री केदार कश्यप के कार्यकाल में अब तक लगभग पांच ओएसडी बदले या हटाए जा चुके हैं। हाल ही में मंत्री कार्यालय में पदस्थ ओएसडी प्रदीप कुमार वैद्य को भी हटाया गया। मीडिया में ट्रांसफर और पदस्थापना के नाम पर कथित लेन-देन के आरोप लगातार सामने आने के बाद यह कार्रवाई हुई, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी जस का तस है—जब एक के बाद एक ओएसडी हटाए जा रहे हैं, तो मंत्री की जवाबदेही तय क्यों नहीं हो रही?सरकारी व्यवस्था में ओएसडी मंत्री कार्यालय का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। वह मंत्री के निर्देशों के अनुरूप काम करता है। ऐसे में यदि बार-बार मंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों पर कथित अनियमितताओं के आरोप लगते हैं और हर बार केवल ओएसडी को हटाकर मामला समाप्त कर दिया जाता है, तो इससे यह संदेश जाता है कि जिम्मेदारी केवल अधीनस्थ अधिकारियों तक सीमित है। आखिर मंत्री कार्यालय में हो रही गतिविधियों की नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही किसकी होगी?प्रदेश में यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि कई विभागों में ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर कथित रूप से दलालों, निजी सहयोगियों और करीबी लोगों की सक्रियता बढ़ी है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो सरकार को केवल चेहरा बदलने के बजाय पूरी व्यवस्था की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए। केवल ओएसडी बदल देने से जनता के मन में उठ रहे सवाल समाप्त नहीं होंगे।पूर्ववर्ती भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में भी ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर एक मंत्री पर गंभीर आरोप लगे थे। राजनीतिक विवाद बढ़ने के बाद विधानसभा चुनाव से पहले उस मंत्री को पद छोड़ना पड़ा था। उस समय भाजपा ने कांग्रेस सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जमकर घेरा था। अब जबकि भाजपा स्वयं सत्ता में है, जनता यही उम्मीद कर रही है कि वही कसौटी वर्तमान सरकार और उसके मंत्रियों पर भी लागू होगी।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया था। इसलिए यदि किसी मंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों पर लगातार आरोप लग रहे हैं और कई ओएसडी बदले जा चुके हैं, तो केवल अधीनस्थ कर्मचारियों पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जाएगी। यदि किसी स्तर पर कोई अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करना ही सुशासन की पहचान होगी।सरकार के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या कार्रवाई केवल ओएसडी तक सीमित रहेगी, या फिर मंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली की भी निष्पक्ष जांच होगी? क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जवाबदेही नीचे से ऊपर नहीं, बल्कि ऊपर से नीचे तय होती है।


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