बलौदाबाजार-भाटापारा/ राजेश मिश्रा/ ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और जनजीवन की आत्मा मानी जाने वाली छत्तीसगढ़ी भाषा इन दिनों उपेक्षा की शिकार है। भले ही इसे वर्षों पहले राजभाषा का दर्जा मिला हो, लेकिन प्रशासनिक और शैक्षणिक स्तर पर इसके संवर्धन व संरक्षण के लिए आज तक ठोस पहल नहीं हो सकी है।राज्य के बौद्धिक जगत और भाषा प्रेमियों में इस बात को लेकर गहरी नाराज़गी है कि पिछले पांच वर्षों से छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिकता देने के लिए कोई विशेष पहल नहीं की गई। कांग्रेस सरकार के पूरे कार्यकाल में आयोग की संरचना अधूरी रही, जिससे न तो भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु योजनाएं बन सकीं और न ही भाषा विकास से जुड़े कार्यक्रमों को अमल में लाया जा सका।अब वर्तमान सरकार से भी अपेक्षाएं टूटती दिख रही हैं। सरकार छत्तीसगढ़ी राजभाषा को लेकर गंभीर नहीं है। यही कारण है कि आयोग में अभी तक कोई नियुक्ति नहीं की गई है। भाषा प्रेमियों का कहना है कि सत्ता बदलने के बावजूद राजभाषा आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में गंभीरता नहीं दिखाई जा रही है।
भूतपूर्व सरकार में मिली पहचान, पर भाषा में काम और प्रतिनिधित्व सीमित
डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ी भाषा को 2007 में राजभाषा का दर्जा मिला था। इसके बाद राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का गठन किया था, जिससे उम्मीद जगी थी कि छत्तीसगढ़ी को प्रशासनिक, शैक्षणिक और सामाजिक जीवन में सशक्त स्थान मिलेगा। किंतु दुर्भाग्य वंश कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हो पाया।हालांकि आयोग के गठन के बाद भी इसमें सिर्फ वरिष्ठ साहित्यकारों, विशेषकर ब्राह्मण समाज से ही नियुक्तियां होती रहीं, जिससे समाज के अन्य वर्गों व युवा प्रतिभाओं को मौका नहीं मिल सका। आयोग गठन में जातीय संतुलन की भी उपेक्षा की गई। छत्तीसगढ़ी भाषा के लोकतांत्रिक विकास की राह में यह एक बड़ा रोड़ा बनकर रह गया।
विद्यालयों में औपचारिकता भर है छत्तीसगढ़ी
प्राथमिक विद्यालयों में छत्तीसगढ़ी भाषा में कुछ पाठों को जरूर शामिल किया गया है, लेकिन शिक्षकों को छत्तीसगढ़ी में पढ़ाने की न तो आदत है, न ही उनमें इसे लेकर गर्व की भावना दिखाई देती है। एक शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि छत्तीसगढ़ी बोलने में आज भी शिक्षक हिचकिचाते हैं, उन्हें लगता है कि इससे उनका सम्मान कम हो जाएगा।
मातृभाषा के मामले में दूसरे राज्यों से पिछड़ रहा है छत्तीसगढ़
जब अन्य राज्यों में मातृभाषा को प्रशासन, शिक्षा और न्याय व्यवस्था में सशक्त रूप से लागू किया जा रहा है – जैसे तमिलनाडु, तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र – तब छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा केवल सांस्कृतिक आयोजनों और औपचारिक घोषणाओं तक ही सीमित रह गई है।
पूर्व अध्यक्ष पर लगे गंभीर आरोप
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष पर भी कई तरह के आरोप लगे हैं कि उन्होंने आयोग की निधि का दुरुपयोग करते हुए अपनी निजी पुस्तकें छपवाईं। इसके बावजूद उनके खिलाफ न तो कोई जाँच बैठाई गई और न ही जवाबदेही तय हुई। पूरा मामला फाइलों में दब कर रह गया।*
अब युवाओं को मिले मौका
राज्य भर में यह मांग तेजी से उठ रही है कि इस बार आयोग की अध्यक्षता किसी युवा प्रतिभा को दी जाए, जो तकनीक, मीडिया और शैक्षणिक क्षेत्रों में सक्रियता से भाषा का विस्तार कर सके। साथ ही यह भी आवश्यक है कि आयोग में समाज के विभिन्न वर्गों से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो, जिससे भाषा का समावेशी विकास हो सके। एवं छत्तीसगढ़ी भाषा पर काम करने वाले विशेषज्ञों को सम्मानित करने की भी आवश्यकता है।छत्तीसगढ़ी भाषा के अस्तित्व की लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर है। अगर समय रहते आयोग को सक्रिय नहीं किया गया, युवाओं को अवसर नहीं मिला, और प्रशासनिक उदासीनता बनी रही, तो यह राजभाषा सिर्फ नाम की रह जाएगी। सरकार को चाहिए कि जल्द से जल्द छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में नई नियुक्ति की जाए और भाषा को उसके वास्तविक हक और सम्मान के साथ सशक्त बनाया जाए।यहां यह भी उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ी के अतिरिक्त हल्बी गोंडी मोरिया सरगुजिया जैसी भाषाओं को भी मातृभाषा घोषित करने की आवश्यकता है एवं इन भाषाओं पर काम करने के लिए सरकार को गंभीरता पूर्वक प्रयास करना चाहिए।
*पूर्व मंत्री ने सीएम को लिखी चिट्ठी*
वहीं छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष पद पर नियुक्ति किए जाने की मांग को लेकर रमन सरकार के प्रथम स्वास्थ्य मंत्री रह चुके मस्तूरी के पूर्व विधायक डॉ कृष्ण मूर्ति बांधी ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को अपने एक युवा समर्थक को अध्यक्ष बनाए जाने की मांग को चिट्ठी लिखी है। वहीं। डॉ बांधी पूर्ववर्ती रमन सरकार को भी कई बार अपने इस युवा साहित्यकार, पत्रकार को छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का अध्यक्ष बनाए जाने की मांग कर चुके हैं लेकिन रमन सरकार में ब्राह्मण समाज से 65 पार उम्र दराज साहित्यकारों को अध्यक्ष बनाते रहे हैं। जिसमें सर्वप्रथम वरिष्ठ साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार श्यामलाल चतुर्वेदी, दानेश्वर शर्मा फिर विनय पाठक को अध्यक्ष बनाए गए और कांग्रेस सरकार में नियुक्ति नहीं हो सकी और अब डेढ़ साल के कार्यकाल में विष्णु सरकार भी इस आयोग में नियुक्ति नहीं कर सकी।