छत्तीसगढ़ी भाषा के तपस्वी साधक एवं प्रभावशाली संवाहक है युवा साहित्यकार -पत्रकार तरुण कौशिक।

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विकास नंद/ सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की उर्वर माटी ने अनेक रत्नों को जन्म दिया है, परंतु भाषा के क्षेत्र में जो दीपक वर्षों से निःस्वार्थ भाव से जल रहा है, उसका नाम है तरुण कौशिक। बिलासपुर के बिल्हा विधानसभा क्षेत्र तिफरा से निकलकर उन्होंने पत्रकारिता और साहित्य के माध्यम से जो कार्य किए, वे आज पूरे छत्तीसगढ़ की भाषायी अस्मिता के उज्ज्वल स्तंभ बन चुके हैं।सर्वव्यापी के प्रधान संपादक, युवा साहित्यकार -पत्रकार तरुण कौशिक जी केवल पत्रकार नहीं हैं , वे विचारधारा के वाहक हैं, जनसंवेदना के प्रतीक हैं, और मातृभाषा के प्रति अगाध श्रद्धा के साथ समर्पित एक क्रांतिकारी चिंतक हैं। ‘डिसेंट रायपुर’ से आरंभ हुई उनकी पत्रकारिता यात्रा कालांतर में एक जनआंदोलन का स्वरूप ले बैठी, जिसमें छत्तीसगढ़ी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिलाना उनका संकल्प बन गया।उनकी लेखनी केवल सूचना का माध्यम नहीं रही, बल्कि वह छत्तीसगढ़ी जनमानस की पीड़ा, अपेक्षा और आत्माभिमान की मुखर आवाज बनी।

उन्होंने पत्रकारिता को जनभाषा के अधिकार की लड़ाई में परिवर्तित कर दिया। ‘ डिसेंट रायपुर और वर्तमान में सर्वव्यापी समाचार पत्र’ में लगातार बाईस वर्षों से भी अधिक समय तक छत्तीसगढ़ी भाषा में संपादकीय लेखन कर उन्होंने न केवल पत्रकारिता को एक नई दृष्टि दी, बल्कि छत्तीसगढ़ी भाषा को प्रतिष्ठा की नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं।*युवा साहित्यकार -पत्रकार तरुण कौशिक ने न केवल लेखन में, अपितु जीवन के प्रत्येक क्षण में छत्तीसगढ़ी भाषा को अपनाया, जिया और आगे बढ़ाया। वे गांव-गांव जाकर साहित्यकारों, कवियों, कलाकारों और युवाओं को जोड़ते रहे। उन्होंने दर्जनों छत्तीसगढ़ी पुस्तकों का लेखन व प्रकाशन किया, और जनसाधारण तक पहुंचाने के लिए पत्रिकाओं, साहित्यिक गोष्ठियों, दीवार लेखन, स्टिकर और कैलेंडर जैसे नवाचारों का सहारा लिया।*वे भाषा के प्रचार को केवल बौद्धिक विमर्श नहीं मानते, बल्कि जन-संवाद का अंग मानते हैं। इसलिए वे सड़क, गाँव, विद्यालय, चौपाल, मेले और पर्व, हर मंच को माध्यम बनाकर छत्तीसगढ़ी को जन-जन की जुबान में बसा देना चाहते हैं। यह संकल्प ही उन्हें असाधारण बनाता है।शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। रमन सिंह सरकार के द्वितीय कार्यकाल में उन्होंने बिलासपुर जिले के अनेक ग्रामीण स्कूलों जैसे काठाकोनी, मेंड्रा, तिफरा, सैदा, बसिया, हरदीकला, देवरी खुद, नगोई, खम्हारिया, पांड आदि के प्राथमिक, मिडिल, हाई और हायर सेकेंडरी स्तर पर उन्नयन का अथक प्रयास किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इन विद्यालयों के वातावरण में भी छत्तीसगढ़ी भाषा का यथोचित सम्मान और प्रयोग हो।उनके कार्यों की प्रभावशीलता को देखते हुए भारत सरकार एवं छत्तीसगढ़ शासन के अनेक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, आईएएस और आईपीएस कैडर के पदाधिकारियों द्वारा उन्हें कई बार सम्मानित किया गया। यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक विचारधारा का सम्मान था, उस विचारधारा का जो छत्तीसगढ़ी भाषा को जनगण की आत्मा मानती है।पूर्व राज्यपाल बलराम दास टंडन जी से हुई उनकी मुलाकात ऐतिहासिक रही, जहां उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने तथा राजभाषा का दर्जा देने हेतु विभिन्न ठोस प्रस्ताव एवं एजेंडे प्रस्तुत किए। यह उनके दूरदर्शी चिंतन और क्रियाशीलता का ज्वलंत उदाहरण है।उनकी स्पष्ट मान्यता है कि यदि किसी राज्य की भाषा को उसके स्कूलों में स्थान नहीं मिलेगा, तो वह भाषा केवल उत्सवों तक सीमित रह जाएगी। छत्तीसगढ़ी भाषा को दैनिक शिक्षण और शासकीय कामकाज की भाषा बनाया जाना आवश्यक है।आज जब हम छत्तीसगढ़ी भाषा को एक व्यवस्थित, समृद्ध और स्वीकार्य स्वरूप में देखते हैं, तो यह कहना अनुचित न होगा कि इसकी नींव में युवा साहित्यकार, पत्रकार तरुण कौशिक का पसीना, श्रम और तपस्विता रची-बसी है।तरुण कौशिक केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक प्रेरणा हैं, एक ऐसी ज्वाला, जो छत्तीसगढ़ की मातृभाषा को उसकी गरिमा और गौरव दिलाने के लिए निरंतर प्रज्वलित रही है। उनका जीवन स्वयं में एक मिशन है । छत्तीसगढ़ी भाषा को भारत की भाषायी धरोहर में सर्वोच्च स्थान दिलाने का मिशन।उनकी लेखनी, उनका संघर्ष, और उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमिट प्रकाशस्तंभ की भांति रहेगा। और छत्तीसगढ़ी भाषा यह बोली, यह भाव, यह आत्मा सदैव उनका ऋण मानेगी, उन्हें स्मरण करेगी और उनके कार्यों को अपना अभिमान बनाए रखेगी।


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