16 हजार एनएचएम कर्मियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल से स्वास्थ्य सेवाएँ ठप।

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बिलासपुर/ भागवत प्रसाद/ ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ में नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम) के करीब 16 हजार से अधिक संविदा स्वास्थ्य कर्मी सोमवार से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। हड़ताल के कारण राज्यभर की स्वास्थ्य सेवाएँ बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरी स्वास्थ्य केंद्रों तक मरीजों को उपचार में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।एनएचएम कर्मियों ने सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा है कि लंबे समय से सेवा देने के बावजूद उन्हें न तो नियमित किया जा रहा है और न ही स्थायी कर्मचारियों के समान वेतनमान दिया जा रहा है। उनकी प्रमुख माँगें इस प्रकार है -नियमितीकरण : स्थायी कर्मचारी का दर्जा। समान वेतन, समान कार्य : वेतन विसंगति दूर करना। भत्ते और अन्य सुविधाएँ : पीएफ, मेडिकल व अन्य लाभ लागू करना।हड़ताल की वजह से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों में ओपीडी सेवाएँ प्रभावित हो गई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में टीकाकरण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ और डिलीवरी जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं पर असर पड़ रहा है। कई जिलों से सूचना है कि एम्बुलेंस सेवा, प्रयोगशाला परीक्षण और ड्यूटी पर तैनात पैरामेडिकल स्टाफ ने भी काम बंद कर दिया है।स्वास्थ्य विभाग ने एनएचएम कर्मचारियों से हड़ताल समाप्त करने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि सरकार उनकी माँगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार कर रही है और बातचीत के लिए दरवाज़ा हमेशा खुला है। लेकिन हड़ताली कर्मचारी संगठन का कहना है कि जब तक लिखित आदेश जारी नहीं होते, आंदोलन जारी रहेगा।विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरा है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य जैसी संवेदनशील सेवा को ठप करना सरकार की नाकामी को दर्शाता है। यदि समय रहते संविदा स्वास्थ्य कर्मियों की माँगों का समाधान कर लिया जाता तो आज हालात इतने गंभीर न होते।धरना और हड़ताल के कारण सबसे ज्यादा परेशानी मरीजों को उठानी पड़ रही है। कई ग्रामीण इलाकों में प्रसव के मामलों को निजी अस्पतालों में भेजना पड़ा, वहीं गरीब मरीजों को जेब से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।एनएचएम कर्मियों का आंदोलन लंबा खिंचने पर पूरे राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं पर गहरा संकट खड़ा हो सकता है। सरकार और कर्मचारियों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। अब देखना यह होगा कि सरकार कब तक ठोस कदम उठाती है और आंदोलन कैसे खत्म होता है।


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