गौरेला/ नूर मोहम्मद/ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में इस बार अध्यक्ष पद को लेकर पत्रकार जगत से जोरदार मांग उठ रही है। अब तक इस संवैधानिक संस्था के शीर्ष पद पर मुख्य रूप से उम्रदराज़ और 70 वर्ष पार साहित्यकारों की ही नियुक्ति होती रही है। इसके चलते छत्तीसगढ़ी भाषा और स्थानीय बोलियों के विकास को व्यापक गति नहीं मिल पाई। पत्रकार संगठनों का कहना है कि भाषा और समाज के वास्तविक सरोकारों से जुड़े, युवा और सक्रिय व्यक्तित्व को इस पद पर आना चाहिए, ताकि भाषा आंदोलन को नई दिशा और ऊर्जा मिल सके।सूत्रों के अनुसार, हाल ही में महासमुंद जिले के बसना में आयोजित एक बड़े समारोह के दौरान विभिन्न पत्रकार संगठनों ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को ज्ञापन सौंपा था। इसमें स्पष्ट मांग की गई कि इस बार अध्यक्ष पद पर किसी युवा पत्रकार–साहित्यकार को ही नियुक्त किया जाए। पत्रकारों ने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा का संवैधानिक, शैक्षणिक और व्यावहारिक विकास अब तक अपेक्षित गति से नहीं हो पाया है।गौरतलब है कि पूर्ववर्ती रमन सिंह सरकार के समय में भी इस आयोग के अध्यक्ष पद पर ऐसे वरिष्ठ साहित्यकार नियुक्त किए जाते रहे, जिनकी उम्र 70 वर्ष से अधिक थी और जिनका किसी राजनीतिक दल से प्रत्यक्ष जुड़ाव नहीं था। हालांकि, उनके कार्यकाल में भाषा संरक्षण की दिशा में कुछ प्रयास हुए, परंतु व्यावहारिक स्तर पर भाषा आंदोलन सीमित दायरे तक ही सिमटा रहा।पत्रकार संगठनों का मानना है कि छत्तीसगढ़ी भाषा और अन्य लोकबोलियों की वास्तविक ताक़त आम जनता और संवाद के स्तर पर है, जिसे पत्रकारिता जगत ने दशकों से संभाला है। इसलिए इस बार अध्यक्ष की नियुक्ति करते समय मुख्यमंत्री को राजनीतिक दबाव से ऊपर उठकर निर्णय लेना चाहिए और भरोसेमंद अफसरों के साथ गंभीर विमर्श करना चाहिए।पत्रकार संगठनों की यह भी मांग है कि यदि किसी सक्रिय युवा पत्रकार-साहित्यकार को यह दायित्व सौंपा जाता है तो न केवल छत्तीसगढ़ी भाषा, बल्कि गोंडी, हल्बी, सरायकी, कोरकू जैसी क्षेत्रीय बोलियों के संरक्षण और संवर्धन को भी गति मिलेगी।अब निगाहें मुख्यमंत्री विष्णु देव साय पर टिकी हैं कि वह पत्रकार जगत की इस मांग को किस रूप में स्वीकार करते हैं। पत्रकार संगठनों को उम्मीद है कि विदेश यात्रा जाने से पहले मुख्यमंत्री इस विषय पर ठोस निर्णय लेकर छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को एक नई दिशा देंगे।