तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
कभी देशभर में “धान का कटोरा” कहलाने वाला छत्तीसगढ़ आज एक अजीब विडंबना का शिकार होता दिखाई दे रहा है। शासन-प्रशासन बदलते रहे, मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल बदलते रहे, लेकिन हालात जस के तस हैं। जनता को मुफ्त का चावल, पेंशन और आवास जैसी योजनाओं में उलझा दिया गया है, वहीं शिक्षा, रोजगार, सड़क, बिजली और पानी जैसे मूलभूत मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं।लोगों का कहना है कि योजनाओं की आड़ में जनता को सुविधाओं का आदी बनाया जा रहा है, जिससे लोकतंत्र का असली स्वरूप जनता द्वारा सवाल पूछने की ताकत, कमज़ोर हो रहा है। यही वजह है कि आज भी ग्रामीण अंचलों में सड़कें बदहाल हैं, युवाओं के पास रोजगार नहीं है, शिक्षा की गुणवत्ता गिरती जा रही है और स्वास्थ्य सेवाएँ बदहाल हैं।छत्तीसगढ़ की पहचान धान के कटोरे के रूप में रही है, लेकिन किसानों की दुर्दशा और कृषि आधारित उद्योगों की कमी से यह पहचान भी खतरे में पड़ रही है। राजनीतिक दल सत्ता में आने के लिए चुनावी घोषणाओं में लोकलुभावन वादे करते हैं, पर सत्ता में आते ही वही वादे जनता के लिए “जुमला” बनकर रह जाते हैं।जनता के बीच अब यह सवाल उठने लगा है, क्या छत्तीसगढ़ सिर्फ “योजनाओं का राज्य” बनकर रह जाएगा या कभी बुनियादी विकास के रास्ते पर भी आगे बढ़ेगा?अगर शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और आधारभूत संरचना की अनदेखी ऐसे ही जारी रही, तो “धान का कटोरा” कहलाने वाला यह प्रदेश आने वाले समय में अपनी पहचान ही खो सकता है।