तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा सवाल उभरकर सामने आ रहा है कि क्या केंद्रीय जांच एजेंसियों का शिकंजा सिर्फ चुनिंदा नेताओं और दलों के लिए है?
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सरकार पर लगे कोयला, शराब और महादेव ऐप घोटाले जैसे आरोपों पर ईडी और सीबीआई की लगातार छापेमार कार्रवाई हो रही है। कई बड़े अफसरों से लेकर नेताओं तक को पूछताछ का सामना करना पड़ रहा है। इन कार्रवाइयों को भाजपा “भ्रष्टाचार पर प्रहार” बताकर पेश कर रही है। लेकिन रमन सिंह सरकार के नान घोटाले पर सन्नाटादूसरी ओर, प्रदेश की जनता अब यह पूछने लगी है कि भूतपूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल का बहुचर्चित “नान घोटाला” (चावल वितरण घोटाला) आखिर कब सामने आएगा? यह घोटाला हजारों करोड़ रुपए का माना गया था, जिसमें खाद्य विभाग और अधिकारियों की संलिप्तता के गंभीर आरोप लगे थे।*
सिर्फ विपक्ष में रहने वालों पर कार्रवाई क्यों?
*विरोधियों का सवाल साफ है किजब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी तो भाजपा ने नान घोटाले को “महाघोटाला” बताया था।तब भाजपा नेताओं ने जांच की मांग को जनता के बीच मुद्दा बनाया था। लेकिन आज भाजपा सत्ता में है, केंद्र में भी और राज्य में भी, फिर ईडी और सीबीआई का ध्यान रमन सिंह सरकार के घोटालों पर क्यों नहीं जा रहा?
*क्या एजेंसियों पर राजनीतिक दबाव?
*राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल सत्ता के समीकरणों के हिसाब से हो रहा है।लेकिन सत्ता पक्ष या पूर्व सत्ता पक्ष से जुड़े दिग्गज नेताओं पर चुप्पी यह दोहरी नीति लोगों के बीच विश्वास की कमी पैदा कर रही है।
*जनता का सवाल – “सिर्फ एकतरफा न्याय क्यों?”
*छत्तीसगढ़ की जनता यह जानना चाहती है कि क्या भ्रष्टाचार सिर्फ कांग्रेस की सरकारों में ही हुआ है?क्या रमन सिंह युग में हुए नान घोटाले, चिटफंड घोटाले और पीडीएस में अनियमितताएं कोई मुद्दा नहीं रह गईं? क्या ईडी-सीबीआई केवल विपक्ष के नेताओं को डराने का औज़ार बन चुकी हैं?भूपेश बघेल सरकार के घोटालों पर जांच होना लोकतंत्र के लिए अच्छा है, लेकिन न्याय तभी सच्चा माना जाएगा जब सभी दलों और सभी नेताओं पर समान कार्रवाई हो। वरना जनता यही मानेगी कि जांच एजेंसियां अब “भ्रष्टाचार विरोधी हथियार” नहीं बल्कि “राजनीतिक हथियार” बन चुकी हैं।