कबीरधाम/ चेतन साहू/ ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को लगभग दो साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन राजभाषा आयोग अब तक बगैर कप्तान के ही चल रहा है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और भाजपा संगठन की चुप्पी ने भाषा प्रेमियों में गहरी निराशा भर दी है। सवाल उठ रहा है कि जब सरकार ने छत्तीसगढ़ी भाषा को बढ़ावा देने का वादा किया था, तो फिर आज तक आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति क्यों नहीं हो सकी?आलोचकों का कहना है कि लगातार एक ही वर्ग ब्राह्मण समाज से अध्यक्ष बनाए जाने की परंपरा आखिर क्यों? कभी विनय पाठक, कभी दुर्गा प्रसाद पारकर, कभी पीसी लाल यादव या फिर न्यायाधीश रहे चंद्रभूषण बाजपेयी। ये सभी उम्रदराज लोग, जो सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद आयोग की कुर्सी पर बैठने लालयित है। जबकि नियम साफ कहता है कि पत्रकारिता जगत से भी प्रतिनिधित्व होना चाहिए, मगर पत्रकार अब तक दरकिनार ही रहे।सूत्रों के मुताबिक इस बार चर्चा में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश चंद्रभूषण बाजपेयी का नाम प्रमुखता से सामने आया है। जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि कांग्रेस से रही है। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस भाई भाजपा में शामिल होकर मलाईदार पद पर गए और अब उनकी बारी भी तय मानी जा रही है। सवाल यह है कि भाजपा संगठन आखिर किस आधार पर ऐसे नामों को तरजीह दे रहा है? बिलासपुर जिले से राजा पाण्डेय को पहले ही पाठ्यक्रम पुस्तक निगम का अध्यक्ष बनाया जा चुका है। अब सवाल यह है कि क्या एक ही जिले से लगातार ब्राह्मणों को आयोग और निगम की कुर्सियों पर बिठाना भाजपा का नया फॉर्मूला है?वहीं संगठन की आंतरिक राजनीति भी कम दिलचस्प नहीं। मंत्री खुशवंत साहेब और नवीन मारकंडेय के पड़ोसी, उप मुख्यमंत्री अरुण साव के करीबियों और केंद्रीय मंत्री तोखन साहू के रिश्तेदार रितुराज साहू का नाम भी सबसे आगे बताया जा रहा है। इधर मस्तूरी के पूर्व विधायक डॉ. कृष्णमूर्ति बांधी ने तो अपने पत्रकार मित्र को अध्यक्ष बनाने की सिफारिश सीधे मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर की है।वहीं भाजपा संगठन ने 31 अगस्त और 02 सितंबर को ही निगम-मंडल, आयोग और कोऑपरेटिव बैंकों में नियुक्तियों की सूची तैयार कर ली थी। मगर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अब तक फाइल दबाकर रखी है। आखिर किसके दबाव में मुख्यमंत्री निर्णय नहीं ले पा रहे? क्या भाजपा आलाकमान की हरी झंडी का इंतजार है या मुख्यमंत्री खुद असमंजस में हैं?वहीं छत्तीसगढ़ी भाषा प्रेमियों का कहना है कि अब वक्त है कि बुजुर्गों और रिटायर्ड नामों की बजाय किसी युवा, ऊर्जावान और दूरदृष्टि रखने वाले व्यक्तित्व को अध्यक्ष बनाया जाए, जो सच में छत्तीसगढ़ी को राष्ट्रीय पहचान दिला सके। यदि फिर से पुराने, थके हुए नामों को कुर्सी सौंप दी गई तो यह आयोग केवल खानापूर्ति का जरिया बनकर रह जाएगा। अब गेंद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के पाले में है। पर सवाल यह है कि वे छत्तीसगढ़ी भाषा को नई ऊर्जा देंगे या फिर वही पुरानी परंपरा निभाएंगे?