राजभाषा आयोग का ‘महाअध्यक्ष’ कौन? नवरात्रि में खुलेगा राजनीतिक ताला, पत्रकारों की दावेदारी कटी।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ सरकार अब तक लंबित पड़े निगम–मंडल व आयोगों में नियुक्तियों को लेकर लगातार सवालों के घेरे में है। खासकर राजभाषा आयोग के अध्यक्ष पद पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के विदेश प्रवास से लौटने के बाद माना जा रहा था कि महत्वपूर्ण पदों पर ताबड़तोड़ नियुक्तियां होंगी, मगर फाइलें अब भी सचिवालय की अलमारी में कैद हैं।

सूत्रों की मानें तो इस बार सरकार राजभाषा आयोग की कमान किसी सशक्त और स्वीकार्य चेहरे को सौंपना चाहती है। चर्चा में जिन नामों ने जोर पकड़ा है, उनमें दुर्गा प्रसाद पारकर, रितुराज साहू, परदेशी राम वर्मा, रामानंद त्रिपाठी, रामेश्वर शर्मा, पीसी लाल यादव, बिहारी लाल और हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश चंद्रभूषण बाजपेयी शामिल हैं। इन आठ नामों में से किसी एक पर अंतिम मुहर लगनी तय मानी जा रही है।इस दौड़ में छत्तीसगढ़ के कई वरिष्ठ और युवा पत्रकारों ने भी अपनी दावेदारी पेश की थी। तर्क यह दिया जा रहा था कि राज्य की भाषा नीति और साहित्यिक गतिविधियों से पत्रकार वर्ग का गहरा रिश्ता है, ऐसे में आयोग की जिम्मेदारी उन्हें मिलनी चाहिए। लेकिन सत्ता गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, सरकार ने उम्रदराज साहित्यकारों और पुराने चेहरों को ही तरजीह देने का मन बना लिया है।युवा पत्रकारों को दरकिनार करना न केवल पत्रकार बिरादरी के लिए निराशाजनक है बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका खामियाजा भाजपा को आगामी चुनावों में भुगतना पड़ सकता है। कारण यह कि पत्रकार समाज प्रदेशभर में संख्या बल के साथ प्रभावशाली वर्ग माना जाता है।राजनीतिक गलियारों में यह बात तेजी से फैल रही है कि सरकार नवरात्रि पर्व में नियुक्ति का आदेश जारी करेगी। दरअसल, गणेश विसर्जन के बाद लगे पितृपक्ष में कोई शुभ कार्य अथवा राजनीतिक घोषणा परंपरागत रूप से टाली जाती है। इस कारण अब सारे फैसले नवरात्रि के शुभ अवसर पर ही होने की संभावना जताई जा रही है।राजभाषा आयोग का अध्यक्ष पद केवल एक प्रतिष्ठा का पद नहीं, बल्कि प्रदेश की सांस्कृतिक व भाषाई नीतियों की दिशा तय करता है। ऐसे में सरकार इस नियुक्ति को जातीय संतुलन, संगठनात्मक दबाव और राजनीतिक संदेश तीनों दृष्टिकोण से साधना चाह रही है।दुर्गा प्रसाद पारकर व रितुराज साहू के नाम पिछड़ा वर्ग व सामाजिक समीकरण को संतुलित कर सकते हैं।परदेशी राम वर्मा व रामानंद त्रिपाठी संगठन की सक्रियता और कार्यकर्ताओं की निष्ठा के प्रतीक माने जाते हैं।रामेश्वर शर्मा, पीसी लाल यादव और बिहारी लाल पुराने वफादार चेहरों में गिने जाते हैं।वहीं, सेवानिवृत्त न्यायाधीश चंद्रभूषण बाजपेयी की दावेदारी को सरकार प्रशासनिक अनुभव और तटस्थ छवि के आधार पर भी देख रही है।विपक्ष पहले से ही सरकार को “ढुलमुल रवैये” के लिए घेर रहा है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पौने दो साल के कार्यकाल के बाद भी भाजपा सरकार निगम–मंडलों और आयोगों में नियुक्तियां नहीं कर पा रही है। वहीं, भाजपा संगठन में भी अंदरखाने यह नाराजगी है कि कार्यकर्ताओं और युवा वर्ग की अनदेखी कर फैसले टाले जा रहे हैं।राज्य में अब निगाहें सीधे नवरात्रि के पहले दिन पर टिकी हैं, जब मुख्यमंत्री और संगठन इस पर अंतिम निर्णय लेकर आदेश जारी कर सकते हैं। तब तक यह सवाल जस का तस है कि आखिर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का ‘महाअध्यक्ष’ कौन बनेगा और क्या पत्रकार बिरादरी की उपेक्षा सरकार को महंगी पड़ेगी?


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