तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों सबसे बड़ी चर्चा है कि सरकार की छवि बचाने की जद्दोजहद। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने हाल ही में अपने प्रमुख सचिव के रूप में सुबोध कुमार सिंह की नियुक्ति की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विशेष भरोसा और विश्वास लेकर आए सुबोध कुमार सिंह को अब सरकार की साख बचाने का कठिन दायित्व सौंपा गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे सचमुच उस भरोसे पर खरे उतर पाएंगे, जब हालात हर ओर से सरकार के खिलाफ खड़े हैं?वहीं सत्ता पक्ष के विधायकों के चेहरे पर मुस्कान है, मगर आंखों में चिंता भी झलक रही है। सार्वजनिक मंचों पर वे सरकार की तारीफ करते दिखते हैं, मगर निजी बातचीत में वे कार्यप्रणाली को लेकर नाराज़गी जाहिर कर रहे हैं। उनका कहना है कि जनता ने भाजपा को भारी बहुमत इसलिए दिया था कि बिजली, पानी, सड़क, रोजगार और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर ठोस पहल होगी, लेकिन हकीकत में जनता को पुराने सवालों के नए बहाने ही मिले हैं।बिजली बिल को लेकर प्रदेशभर में गुस्सा है। गरीब परिवारों की जेब पर बोझ बढ़ रहा है, वहीं सरकारी अमले का रवैया उपेक्षात्मक है। राशन कार्ड छंटनी का मामला तो आग में घी डालने जैसा हो गया है। हजारों परिवार सूची से बाहर कर दिए गए, जिससे नाराज़गी और बढ़ी है। यही नहीं, छोटे-छोटे स्थानीय मुद्दे भी अब बड़े सवाल बनते जा रहे हैं। जनता कहने लगी है कि नई सरकार आई है, लेकिन समस्याओं का पुराना ढर्रा जस का तस है।वहीं मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह को मोदी और साय, दोनों का भरोसा हासिल है। लेकिन विश्वास के साथ सबसे बड़ा इम्तिहान भी आता है। अब अगले दो वर्षों में उन्हें न केवल मुख्यमंत्री सचिवालय को चुस्त-दुरुस्त करना होगा, बल्कि जमीनी स्तर तक यह संदेश देना होगा कि सरकार वाकई संवेदनशील है। नौकरशाही की सुस्ती और भ्रष्टाचार की जड़ें तोड़ना सबसे बड़ी चुनौती होगी। यदि अधिकारी ही आम जनता से मुंह फेर लेंगे, तो सरकार चाहे जितनी योजनाएँ गिनाए, फायदा नहीं मिलने वाला।वहीं राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर यही हाल रहा तो 2028 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। मतदाता अब न नारों से प्रभावित हो रहा है, न ही बड़े-बड़े वादों से। उसे चाहिए साफ नीयत और तेज कार्यशैली। यही वजह है कि समीक्षकों का कहना है कि सरकार छवि सुधारने के लिए ‘फेस वॉश’ लगाए या मेकअप, जनता अब आईना लेकर खड़ी है।भाजपा की सरकार के पास अभी दो साल का वक्त है। अगर सुबोध कुमार सिंह प्रशासनिक सर्जरी कर पाने में सफल होते हैं, तो सरकार की न केवल छवि सुधरेगी बल्कि चुनावी नैया भी पार लग सकती है। लेकिन अगर ढर्रा यही चलता रहा तो व्यंग्य यही कहेगा कि छवि चमकाते-चमकाते कुर्सी फिसल गई, और सत्ता विपक्ष के पास फिर लौट गई।