संपादक की कलम से..छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय : न्याय के 25 साल, उम्मीदों का नया पड़ाव। - Sarvavyapi संपादक की कलम से..छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय : न्याय के 25 साल, उम्मीदों का नया पड़ाव। - Sarvavyapi

संपादक की कलम से..छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय : न्याय के 25 साल, उम्मीदों का नया पड़ाव।

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

25 वर्ष पूर्व 27 सितंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के साथ ही न्यायिक व्यवस्था के स्वतंत्र ढांचे की नींव रखी गई। बिलासपुर में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की स्थापना महज एक संस्थागत कदम नहीं था, बल्कि यह उस विश्वास का प्रतीक था जो जनता ने नए राज्य से जोड़ा था, कि न्याय अब निकट होगा, सुलभ होगा और समयबद्ध होगा। आज, दो दशक से अधिक की यात्रा पूरी करने के बाद, यह न्यायालय अपनी रजत जयंती मना रहा है।पिछले 25 वर्षों में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने कई ऐसे फैसले दिए हैं, जिन्होंने न केवल विधिक व्यवस्था को मजबूती दी, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक जीवन में भी गहरा असर डाला। पर्यावरण संरक्षण से लेकर आदिवासी अधिकारों, भूमि विवादों और औद्योगिक न्याय तक। इस अदालत ने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है।यह भी उल्लेखनीय है कि देशभर में जब न्याय में विलंब और प्रक्रियात्मक जटिलताओं को लेकर प्रश्न उठते रहे, तब छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने लोक अदालतों, मध्यस्थता और जनहित याचिकाओं के जरिए न्याय को अपेक्षाकृत आसान और नजदीकी बनाने का प्रयास किया।आज शनिवार, 27 सितंबर 2025 को आयोजित रजत जयंती समारोह में पूरे देश की न्यायपालिका की निगाहें बिलासपुर पर टिकी हैं। केंद्रीय विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, राज्यपाल रामेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल रमेश बैस की उपस्थिति इस आयोजन की गरिमा को और बढ़ा रही है।हाईकोर्ट परिसर में स्मारिका विमोचन, न्यायिक यात्रा का मूल्यांकन और भविष्य की दिशा पर विमर्श इस आयोजन को ऐतिहासिक बना देगा। यह केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि बीते 25 साल के अनुभवों से आगे की राह तय करने का अवसर भी है।फिर भी, यह भी स्वीकारना होगा कि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की यात्रा केवल उपलब्धियों की कहानी नहीं है। लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के लोगों के लिए न्याय तक पहुंच आसान नहीं हो पाई है। अधिवक्ता समुदाय बुनियादी ढांचे की समस्याओं से जूझ रहा है और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया अभी पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकी है। इसके साथ ही निचली अदालतों और उच्च न्यायालय के बीच समन्वय की कमी अक्सर न्याय में विलंब का कारण बनती है। यदि अगले 25 वर्षों की दिशा तय करनी है, तो न्यायालय को इन बुनियादी चुनौतियों पर गंभीरता से काम करना होगा।रजत जयंती समारोह केवल अतीत का जश्न नहीं, बल्कि भविष्य का संकल्प होना चाहिए। तकनीकी सुधार, ई-कोर्ट्स की सशक्त व्यवस्था, ग्रामीण और आदिवासी इलाकों तक न्याय की पहुँच और लंबित मामलों के शीघ्र निपटान की ठोस रणनीति। यही वो क्षेत्र हैं जिन पर ध्यान केंद्रित करना होगा। साथ ही, समाज और न्यायपालिका के बीच विश्वास का सेतु और मजबूत करना होगा। क्योंकि न्याय केवल फैसले देने का नाम नहीं है, बल्कि जनता के मन में विश्वास जगाने की प्रक्रिया भी है।छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की 25 साल की यात्रा हमें यह याद दिलाती है कि न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि यह स्तंभ मजबूत रहेगा तो संविधान की आत्मा जीवित रहेगी। आज जब पूरे देश की न्याय व्यवस्था नई चुनौतियों और अवसरों के मोड़ पर खड़ी है, तब बिलासपुर का यह रजत जयंती समारोह हमें एक ही संदेश देता है कि “न्याय केवल कागजों में नहीं, बल्कि आमजन के जीवन में उतरे।”


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