तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी /
छत्तीसगढ़ के गांव-गांव, शहर-शहर म आज एक नई बीमारी घर कर ले हवय— बंटवारा। बंटवारा कहे बर तो अपन हक-पाई के बखत एक कानूनी व्यवस्था बने रहिस, जऊन ले संपत्ति के न्यायिक बंटन हो सके। फेर धीरे-धीरे ये बंटवारा ह अब्बड़ खतरनाक सामाजिक रूप धारण कर ले हवय।छत्तीसगढ़ के दाई-ददा मन अपन संतान ल बड़े मेहनत, अपन खून-पसीना बहाके पाले-पोसे हें। खेत-खार, घर-द्वार, गोरस, दाई-ददा के मेहनत ह परिवार ल एकताबद्ध बनाय रखिस। दाई-ददा के सपना रहिस— “सगे-सम्बंधी सब्बो एके छांव म रहिहीं, दुख-सुख म एक-दूसर के संग दिहीं।”लईका मन जऊन घर म सुघ्घर संग मिलजुल के पाले गे रहिन, ओखर सादी-बिहाव के बाद परिवारिक स्थिति बदलथे। पतो (बहू) मन के आगमन के बाद परिवारिक खींचतान सुरु हो जाथे। “हमर हक अउ तुमर हक” के बात म धीरे-धीरे ममता, भाईचारा अउ अपनापन बंट जाथे।जिहां दाई-ददा मन अपन जिनगी भर मेहनत करके खेती-बाड़ी के जमीन बनाए रहिन, ओखर बेटा-बेटी मन आज ओकर टुकड़ा-टुकड़ा कर दिथें। घर-द्वार बंट जाथे, खेत-खार टुकड़ा-टुकड़ा हो जाथे।परिवार जिहां एक समय म सुख-दुख के साझेदार रहय, उहां आज दरवाजा लगाके “हमर-तुमर” के दीवार खड़ा हो जाथे। ये हालत देखके दाई-ददा मन के आंखी भर आथे। उंकर सपना के घर-आंगन म अब तिरस्कार अउ उदासी बस जाथे।बंटवारा सिरिफ खेत-खार तक सीमित नइ रहिगे, अब्बड़ दुख के बात ये आय कि रिश्ता-नाता, ममता-प्यार, भाई-भाई के अपनापन, बहिनी-दाई के दुलार— सब्बो बंटत जात हवय।जिहां समाज के मजबूती परिवारिक एकता म रहिस, ओकेच जड़ ह आज धीरे-धीरे कमजोर होवत जावत हवय।समाधान के ए रस्ता हवै लइका मन ल बचपन ले बताना जरूरी हे कि दाई-ददा के मेहनत, परिवार के एकता, अउ आपसी प्रेम के कीमत काबर जरूरी हवय। परिवार म विवाद होवय, फेर ओकर हल संवाद अउ समझदारी ले निकले।दाई-ददा के आशीर्वाद म परिवार के समृद्धि बसथे। जिहां बड़े मन के इज्जत होथे, उहां परिवारिक संकट कभी जड़ नइ पावत।बंटवारा खेत-खार के होवय, मनखे के मया, परिवारिक एकता अउ संस्कार के नइ।छत्तीसगढ़िया संस्कृति म “एक घर, एक संग” के परंपरा ल जिंदा रखे के जिम्मेदारी आज हमन सबो झन लहे।


