गौरेला-पेंड्रा-मरवाही/नूर मोहम्मद/ब्यूरो चीफ सर्वव्यापी
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष पद की नियुक्ति को लेकर इन दिनों राजनीतिक गलियारों में जबरदस्त हलचल मची हुई है। हर बार की तरह इस बार भी चर्चा का केंद्र यही सवाल है कि आयोग की बागडोर किसे सौंपी जाएगी? परंपरागत रूप से देखा जाए तो अब तक आयोग की कमान या तो उम्रदराज साहित्यकारों को दी जाती रही है या फिर ब्राह्मण समाज के प्रतिनिधियों को प्राथमिकता दी गई है। इस व्यवस्था ने अब छत्तीसगढ़ी समाज के भीतर असंतोष और सवाल दोनों खड़े कर दिए हैं—क्या छत्तीसगढ़ की अस्मिता और भाषा की असली पहचान को जीने वाले साहित्यकारों, पत्रकारों और युवा कार्यकर्ताओं को अब भी दरकिनार किया जाएगा?छत्तीसगढ़ की माटी और लोकसंस्कृति से गहराई से जुड़े पत्रकारों और साहित्यकारों का कहना है कि यह आयोग सिर्फ एक औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि भाषा और संस्कृति की दिशा तय करने वाला एक सशक्त मंच है। ऐसे में यदि नेतृत्व फिर परंपरागत और राजनीतिक सोच पर आधारित रहा तो भाषा के वास्तविक विकास की गति थम सकती है।सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के सामने इस बार आयोग में युवा और सक्रिय चेहरा लाने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। कई सामाजिक संगठनों, पत्रकार संघों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं ने मांग की है कि आयोग की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को दी जाए जिसने वास्तव में छत्तीसगढ़ी भाषा, लोककला और संस्कृति के संरक्षण में कार्य किया हो, न कि केवल साहित्यिक पहचान या राजनीतिक नजदीकी के आधार पर चयन हो।छत्तीसगढ़ी भाषा की अस्मिता पर बहसभाषा विशेषज्ञों और सामाजिक चिंतकों का कहना है कि जब तक आयोग में जमीनी स्तर पर काम करने वाले व्यक्तियों को स्थान नहीं मिलेगा, तब तक भाषा के प्रचार-प्रसार की नीतियाँ केवल कागजों तक सीमित रहेंगी। छत्तीसगढ़ी भाषा को शिक्षा, प्रशासन और तकनीकी क्षेत्रों में सशक्त करने के लिए आयोग का सक्रिय, आधुनिक और जन-सरोकारों से जुड़ा नेतृत्व जरूरी है।
राजनीतिक परंपरा बनाम नई सोच
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अब वक्त आ गया है कि परंपरा से हटकर वास्तविक प्रतिनिधित्व दिया जाए। यदि आयोग का अध्यक्ष सच में छत्तीसगढ़ी समाज का प्रतिनिधि होगा, तो भाषा, साहित्य, संस्कृति और लोककला के क्षेत्र में नयी ऊर्जा का संचार होगा। इससे न केवल युवाओं में उत्साह बढ़ेगा बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मजबूत सांस्कृतिक आधार भी तैयार होगा।
आगे क्या?
साय सरकार और भाजपा संगठन के सामने अब एक बड़ा निर्णय है—क्या वे पुरानी परंपरा को दोहराते हुए फिर किसी बुजुर्ग या ब्राह्मण समाज के साहित्यकार को चुनेंगे, या फिर इस बार छत्तीसगढ़ की धरती से जुड़े, सक्रिय और कर्मशील पत्रकार-साहित्यकार को यह जिम्मेदारी देंगे?छत्तीसगढ़ की जनता और बौद्धिक वर्ग अब इस फैसले की प्रतीक्षा में हैं, क्योंकि यह केवल एक पद की नियुक्ति नहीं बल्कि भाषा की दिशा और दशा तय करने वाला ऐतिहासिक निर्णय होगा।


