वरिष्ठ अफसरों की फाइलें जूनियर अफसर को सलाम ठोकेंगी, उम्र में छोटे विकास शील के आगे बड़े-बड़े कैंडर धराशायी! - Sarvavyapi वरिष्ठ अफसरों की फाइलें जूनियर अफसर को सलाम ठोकेंगी, उम्र में छोटे विकास शील के आगे बड़े-बड़े कैंडर धराशायी! - Sarvavyapi

वरिष्ठ अफसरों की फाइलें जूनियर अफसर को सलाम ठोकेंगी, उम्र में छोटे विकास शील के आगे बड़े-बड़े कैंडर धराशायी!

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तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ की नौकरशाही में एक बड़ा फेरबदल कल 30 सितंबर को देखने को मिलेगा। मौजूदा मुख्य सचिव अमिताभ जैन की विदाई के साथ ही छत्तीसगढ़ कैडर के तेज-तर्रार आईएएस अधिकारी विकास शील राज्य के नये मुख्य सचिव के रूप में पदभार ग्रहण करेंगे। यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि नौकरशाही की सियासत और वरिष्ठता की सीढ़ियों को लेकर उठते सवालों का भी केंद्र बन गया है।क्योंकि इस पद पर विकास शील की नियुक्ति के साथ ही सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर वरिष्ठता की कतार में सबसे आगे खड़े अधिकारी अपर मुख्य सचिव रेणु पिल्ले, सुब्रत साहू, मनोज कुमार पिंगुआ और ऋचा शर्मा को क्यों दरकिनार किया गया? क्या मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया है या फिर प्रशासनिक कसौटी पर विकास शील सबसे योग्य माने गए?वरिष्ठों की उपेक्षा पर गरम माहौलप्रशासनिक हलकों में कानाफूसी जोरों पर है कि उम्र और अनुभव में जूनियर विकास शील को मुख्य सचिव बनाना कहीं न कहीं “वरिष्ठ अफसरों की अनदेखी” के रूप में देखा जा रहा है। रेणु पिल्ले, जो लंबे समय से प्रशासनिक क्षेत्र की धुरंधर मानी जाती हैं, अचानक किनारे क्यों कर दी गईं? सुब्रत साहू, जिनकी पहचान चुनाव प्रबंधन से लेकर कठोर निर्णयों तक की रही है, उन्हें क्यों मौका नहीं मिला? मनोज कुमार पिंगुआ, जो केंद्र में भी अपनी पैठ बना चुके हैं, और पर्यावरण-वन विभाग में मजबूत पकड़ रखने वाली ऋचा शर्मा इन सबके भविष्य को लेकर अब संशय की धुंध छा गई है।मुख्यमंत्री पर नजरेंअब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री विष्णु देव साय पर टिक गई हैं। यह तय करना उनके लिए आसान नहीं होगा कि इन वरिष्ठ अधिकारियों को किस भूमिका में समायोजित किया जाए। अगर उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाती हैं तो प्रशासनिक संतुलन बना रहेगा, लेकिन अगर उन्हें हाशिए पर डाला गया तो आने वाले समय में खींचतान और असंतोष बढ़ना तय है।नौकरशाही में संदेशविकास शील की नियुक्ति से एक बड़ा संदेश गया है। अब सीनियरिटी नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री का भरोसा ही असली पासवर्ड है। इससे उन अफसरों की बेचैनी स्वाभाविक है जिन्होंने तीन-तीन दशक तक सेवा देकर यह उम्मीद पाली थी कि कभी न कभी मुख्य सचिव की कुर्सी उन तक पहुंचेगी।छत्तीसगढ़ की जनता अब कह रही है बड़े बाबू अब फाइलों में सीनियरिटी ढूंढते रह गए, और छोटा बाबू मुख्य सचिव की कुर्सी पर जा बैठा। नौकरशाही में अब घड़ी की सुई नहीं, मुख्यमंत्री की कलम ही समय बताती है। यह समीक्षात्मक बदलाव न सिर्फ विकास शील के लिए बड़ी जिम्मेदारी लेकर आया है, बल्कि रेणु पिल्ले, सुब्रत साहू, मनोज पिंगुआ और ऋचा शर्मा जैसे दिग्गज अफसरों के भविष्य की पटकथा भी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के कलम की स्याही पर टिकी है।


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