विकास नंद/ सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राज्य शिक्षा आयोग पिछले आठ वर्षों से बिना अध्यक्ष के कार्य कर रहा है। वर्ष 2013 में गठित इस आयोग में अब तक केवल एक ही अध्यक्ष नियुक्त हुए थे, लेकिन 2015 से अब तक यह पद रिक्त है। अध्यक्ष न होने के कारण आयोग की कार्यप्रणाली पूरी तरह सचिव और बाबुओं के भरोसे चल रही है। परिणामस्वरूप शिक्षा से संबंधित नीतियों, योजनाओं और सुधारों पर ठोस निर्णय नहीं हो पा रहे हैं।राज्य शिक्षा आयोग का गठन शिक्षकों की भर्ती, पदोन्नति, शिक्षा गुणवत्ता, नीति निर्धारण और नवाचारों के लिए किया गया था। आयोग की भूमिका शिक्षा के सर्वांगीण विकास में अहम मानी जाती है, लेकिन अध्यक्ष का पद रिक्त होने से यह संस्था केवल नाममात्र की बनकर रह गई है।
आयोग की वेबसाइट और रिकॉर्ड्स में 51 बैठकें दर्ज हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश औपचारिकताएं मात्र रही हैं। सचिव और अन्य अधिकारी फाइलें तैयार करते हैं, लेकिन अध्यक्ष न होने से निर्णय प्रक्रिया ठप पड़ी रहती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अध्यक्ष के अभाव में आयोग की विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव और सुधार योजनाएं फाइलों में अटकी पड़ी हैं। राज्य के शिक्षक, विद्यार्थी और शिक्षा विभाग इससे प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
इतिहास:
राज्य शिक्षा आयोग का गठन वर्ष 2013 में किया गया था और पहले अध्यक्ष एच.एस. उपाध्याय बने थे। उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद से अब तक किसी नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं की गई।
विशेषज्ञों की राय:
शिक्षा विशेषज्ञों और शिक्षकों का कहना है कि राज्य सरकार को तत्काल नए अध्यक्ष की नियुक्ति करनी चाहिए, ताकि शिक्षा से जुड़ी नीतियों पर गंभीरता से काम हो सके और राज्य की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा सके।


