तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
दशहरा पर्व तो संपन्न हो गया, पर बिलासपुर जिले के शिक्षकों के लिए यह पर्व इस बार “फॉर्म और फाइलों” में ही सिमट गया।अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) एवं निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी बिलासपुर द्वारा जारी आदेश (ज्ञापन क्रमांक क/कानूनगो/निर्वाचन/2025, दिनांक 03 अक्टूबर 2025) के तहत 04 और 05 अक्टूबर को दशहरा अवकाश होने के बावजूद निर्वाचन कार्य के लिए ड्यूटी लगाई गई थी।इस आदेश के तहत बिलासपुर, बेलतरा, मस्तूरी और बिल्हा क्षेत्र के तहसीलदार, पटवारी, निर्वाचन सुपरवाइजर, बीएलओ और डाटा एंट्री ऑपरेटरों को मतदाता सूची के पुनः निरीक्षण कार्य में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया था।दशहरा पर जब पूरा प्रदेश रावण दहन देखने निकला था, तब जिले के बीएलओ बने शिक्षक स्कूल के बजाय “निर्वाचन कक्ष” में कागज़ दहन करते दिखे। एक शिक्षक ने तंज भरे स्वर में कहा कि हमने सोचा था छुट्टी में घर की सफाई करेंगे, पर आदेश आ गया मतदाता सूची की सफाई करो! लगता है शिक्षकों की छुट्टी अब सरकारी दस्तावेज़ बन गई है, जो सिर्फ़ कागज़ पर दिखती है। दूसरे शिक्षक ने कहा कि हम नवरात्र में स्कूल में गरबा करवाते हैं, और दशहरा में मतदाता सूची का पुनरीक्षण। कोई बताए, हम शिक्षक हैं या ‘ऑल टाइम सरकारी सैनिक’? प्रशासन का कहना है कि यह कार्य निर्वाचन कार्यक्रम के निर्धारित समय-सारणी के तहत अनिवार्य था और इसकी अवहेलना संभव नहीं थी।लेकिन कर्मचारियों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या हर तात्कालिक कार्य का भार शिक्षकों पर ही डाला जाएगा? क्या शिक्षण कार्य और त्योहारों की मर्यादा अब सरकारी प्राथमिकता में नहीं रही? इस बार दशहरा में रावण तो जल गया, पर शिक्षकों की छुट्टी, उनकी उम्मीदें, और आराम का सपना प्रशासनिक आदेशों की आग में भस्म हो गया। कह सकते हैं कि रावण हर साल जलता है, पर शिक्षक हर आदेश के साथ फिर से जल उठता है।


