तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक नया फैशन ट्रेंड चर्चा का विषय बना हुआ है। अफसरों की दाढ़ी। चाहे वह कलेक्टर हों या जनपद सीईओ, ब्लॉक अधिकारी हों या युवा एसडीएम, दाढ़ी का चलन तेज़ी से बढ़ा है। कुछ अफसर इसे “व्यक्तित्व की परिपक्वता” बता रहे हैं, तो कुछ इसे “सादगी और आत्मविश्वास का प्रतीक” मानते हैं। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह फैशन से ज़्यादा एक संदेश है?
जहां पहले साफ-सुथरे चेहरे को “सरकारी प्रोफेशनल लुक” माना जाता था, वहीं अब कई अधिकारी “रफ एंड रियल” अपीयरेंस में दिख रहे हैं। सोशल मीडिया पर उनकी दाढ़ी वाली तस्वीरें वायरल हो रही हैं।
कभी निरीक्षण के दौरान, कभी बैठकों में।एक वरिष्ठ अधिकारी ने मज़ाक में कहा कि अब तो पहचानने में भी मुश्किल होती है कि कौन कलेक्टर है और कौन पत्रकार!
कुछ मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह ट्रेंड कहीं न कहीं प्रशासनिक दबाव और कार्यस्थलीय तनाव से भी जुड़ा है। लगातार दौरे, शिकायतें, और राजनीतिक खींचतान के बीच अफसर अपनी सहजता बनाए रखने के लिए “नेचुरल लुक” अपनाने लगे हैं।
एक युवा अधिकारी ने कहा, “दाढ़ी सिर्फ फैशन नहीं, यह मेरे लिए सहजता का हिस्सा है। रोज़ शेविंग का बंधन तोड़कर मैं अपने असली रूप में सहज महसूस करता हूँ।”गांव और शहरों में जब अफसर दाढ़ी में नजर आते हैं, तो जनता के बीच भी एक नई छवि बनती है — “गंभीर, चिंतनशील और जमीन से जुड़े अधिकारी” की।लेकिन कुछ पारंपरिक सोच वाले लोग इसे “लापरवाही और बेपरवाही” का संकेत भी मानते हैं।
एक बुज़ुर्ग नागरिक ने कहा कि पहले के अफसर हमेशा सलीकेदार रहते थे, अब तो लगता है जैसे सब ‘रॉबिनहुड’ बन गए हैं।
कुछ अफसरों का मानना है कि दाढ़ी रखना भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक सौंदर्यबोध से जुड़ा है।“हमारे संत, चिंतक, और नेता — सब दाढ़ी वाले ही तो रहे हैं,” एक अफसर मुस्कराते हुए कहते हैं, शायद अब अफसरों में भी वही आत्मचिंतन का भाव जाग रहा है।
अफसरों में दाढ़ी का यह चलन केवल बाहरी रूपांतरण नहीं, बल्कि अंदरूनी बदलाव का भी संकेत हो सकता है एक ऐसा दौर, जहां प्रशासनिक कार्यशैली में औपचारिकता की जगह सहजता, दिखावे की जगह आत्मविश्वास और पारंपरिक “ब्यूरोक्रेटिक ठसक” की जगह मानवीयता लौटती दिख रही है।फिलहाल, इतना तो तय है कि साफ चेहरा अब पुराना ट्रेंड है, दाढ़ी में है नया डिसिप्लिन और डिस्टींक्शन।


