तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
जब दूसरे अफसर फाइलों के पीछे छिपे रहते हैं, तब सुनील जैन फील्ड में नजर आते हैं। बिलासपुर संभाग के संभागीय आयुक्त की पहचान अब “कड़क अफसर” से ज्यादा “नतीजा देने वाले अफसर” के रूप में बन चुकी है।संभागीय आयुक्त सुनील जैन के आने के बाद बिलासपुर, मुंगेली, कोरबा, रायगढ़ , जांजगीर-चांपा,सक्ति और गौरेला पेंड्रा मरवाही जैसे जिलों में प्रशासनिक सक्रियता का स्तर noticeably बढ़ा है। पिछले कुछ महीनों में उन्होंने कई विभागीय बैठकों को न केवल पुनर्परिभाषित किया, बल्कि विकास कार्यों की समीक्षा को भी वास्तविक धरातल तक पहुंचाया।सूत्र बताते हैं कि जैन उन अफसरों में से हैं जो “केवल रिपोर्ट” पर भरोसा नहीं करते, बल्कि मौके पर जाकर सच्चाई देखना पसंद करते हैं। यही कारण है कि उनकी बैठकें देर तक चलती हैं, और कई बार अधिकारी उसी दिन फील्ड में लौटकर सुधारात्मक कार्रवाई करते नजर आते हैं।हालांकि, हर सख्त अफसर की तरह उनके विरोधी भी हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे “बहुत ज़्यादा परिणाम केंद्रित” हैं और “लोगों की नब्ज़” समझने में थोड़ा वक्त लगाते हैं। लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो उनके कार्यकाल में जवाबदेही बढ़ी है, भ्रष्टाचार के मामलों में नियंत्रण आया है और कई ठप परियोजनाएं पुनर्जीवित हुई हैं।बिलासपुर संभाग अब निगरानी में रहने वाला संभाग कहलाने लगा है, और इसका श्रेय निस्संदेह संभागीय आयुक्त सुनील जैन की नेतृत्व शैली को जाता है।


