तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
कभू-कभू जीवन मं ए बात समझना जरूरी होथे कि बदलाव बाहर ले नई, भीतर ले आथे। चलो, आज एक नवा सुरुआत खुद ले करत हन ,बिना दिखावा, बिना तुलना, बिना डर। अपन छत्तीसगढ़ बर, अपन समाज बर, अपन छत्तीसगढ़ी भाषा बर।आज दुनिया दौड़त हावे, हर कोई दूसर मन के जइसने बने के चक्कर मं अपन असली चेहरा गवा देथें। फेर हमर छत्तीसगढ़िया तो वो हावे, जऊन अपन मेहनत, अपन पसीना अउ अपन माटी ले इज्जत कमाथे। वो दूसर के नकल नई करथे, अपन रस्ता खुद बनाथे।छत्तीसगढ़ के धरती सोन जइसने उपजाऊ हावे। ए माटी मं भगवान के कृपा हावे, किसान के मेहनत हावे, अउ मया-दया से भरे जन मन के दिल हावे। पर सवाल ए हावे, का हमन अपन माटी ल अपन गर्व मानथन?आज के समय मं जरूरत हावे कि हमन अपन गांव, अपन खेत, अपन संस्कृति ल सम्मान देन। जऊन काम दूसर नई करही, ओ काम हमन खुद करन।छत्तीसगढ़ी बोली सिर्फ भाषा नई हावे, ये हमर आत्मा हावे।ये मं मया हावे, अपनापन हावे, अउ जिनगी के सुघ्घर सादगी हावे।फेर दुख के बात ए हावे कि आज के पढ़े-लिखे पीढ़ी अपन बोली ल पिछड़ापन समझथे।का बोली अपनपन के निशानी होके शर्म करे जइसे बात हावे?नइ। छत्तीसगढ़ी मं बात करन, लिखन, गान अउ अपन विचार रखन ,ये गर्व के बात हावे।हमन जऊन दिन अपन बोली मं आत्मविश्वास ले बात करन लगबो, ओ दिन ले हमर छत्तीसगढ़ नई दिशा मं बढ़ जाही। दूसर मन का सोच मं नइ फसव।लोग का कहिहीं, ए चिंता छोड़व।तुमन जऊन काम करथव, का ओ मं तुम्हर आत्मा ल संतोष मिलथे?अगर हां, त ओ कामच सबसे पवित्र हावे। बिना आत्म-संतोष के जीवन, बिना जड़ के पेड़ जइसने हावे। ऊपर त बढ़थे, फेर अंदर ले सूख जाथे।काबर जिंदगी के असली अर्थ ए हावे कि हमन ओ काम करन जेमां अपन मन के खुशी मिलय, चाहे दुनिया का का लगे। हमर पुरखा मन हिम्मत ले काम करिन, अपन हाथ ले गांव बसाइन, समाज बनाइन।अब हमर जिम्मेदारी हावे , ए पहचान ल जिन्दा रखे के। इतिहास हमेशा ओमन लिखथें, जऊन मन दूसर के राह नई अपन खुद के राह बनाथें।छत्तीसगढ़ के कहानी, हमर मेहनत के गाथा, हमर संघर्ष के सुगंध, ये सब्बो चीज अब कागज मं नई, मन मं उतरे के समय आ गे हावे।अब समय आ गे हावे कि हमन दूसर के भरोसा नई, अपन मेहनत मं भरोसा रखन। अपन समाज बर काम करन, अपन भाषा बर जूझन, अउ अपन माटी बर जीयन। आज जऊन बीज बोहबो, ओई कल हमर पीढ़ी के छांव बनही। हमर बोली हमर गौरव, हमर मेहनत हमर मान, अपन छत्तीसगढ़ के खातिर चलो गढ़न अपन पहचान।जय छत्तीसगढ़ महतारी, जय छत्तीसगढ़ी।


