तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
कभी किसी रिश्ते में प्यार था, विश्वास था, और तेरह बरस का साथ था पर अब अदालत की दहलीज पर बस आरोप हैं, आंसू हैं और एक दर्दभरी आवाज उठ रहा है कि सच कह रहा हूं, तो जेल भेज देना जज साहब।यह आवाज किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस इंसानियत की है जो कानून और संवेदना के बीच दम तोड़ती नजर आ रही है।सात साल तक यौन शोषण के आरोप में मौन रहा एक अफसर, जिसने तेरह बरस तक एक महिला के साथ वैवाहिक समान संबंध निभाया- आज वही रिश्ता “एफआईआर” के दस्तावेज़ में “बलात्कार” कहलाने लगा।सवाल उठता है कि अगर वो रिश्ता प्रेम था, तो अपराध कैसे बन गया?और अगर अपराध था, तो तेरह साल तक उस प्रेम ने कानून की आंखों में धूल क्यों झोंकी?न्याय की कसौटी पर तौला जा रहा यह मामला न केवल एक व्यक्ति का संघर्ष है, बल्कि उस व्यवस्था की परीक्षा भी है जो अक्सर “सुनवाई” से पहले “धारणा” बना लेती है।आरोपित अफसर की भावनात्मक कविता अब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है कि दिल टूटा है, पर भरोसा बाकी है,सच आज भी सांसों में बाकी है,अगर मैं झूठा हूं — तो जेल भेज देना,पर न्याय को भी आईना दिखा देना।”इन शब्दों ने जनमानस को झकझोर दिया है। समाज में अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या हर आरोप सच होता है, या कभी-कभी सच आरोपों के नीचे दब जाता है?कानून महिला की सुरक्षा के लिए बना है — लेकिन क्या इसका उपयोग कभी-कभी भावनात्मक प्रतिशोध के औजार के रूप में तो नहीं हो रहा?सात बरस की चुप्पी और तेरह बरस का साथ आखिर कौन-सा सच छुपा रहा है?न्यायपालिका के सामने अब चुनौती सिर्फ एक केस की नहीं, बल्कि “सत्य और भावनाओं” के बीच संतुलन की है।क्योंकि हर सजा कानून से नहीं, कभी-कभी अंतरात्मा के न्याय से भी तय होती है।अंत में बस यही पुकार “सजा दे दो, अगर मैं गुनहगार हूं, पर पहले सुन लो — मैं सच बोल रहा हूं, जज साहब।”


