तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में 15 नवंबर से धान खरीदी की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि आज तक प्रदेश के जिला सहकारी केन्द्रीय बैंकों में अध्यक्ष और संचालक मंडल सदस्यों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। इस लापरवाही ने न केवल सरकार की तैयारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि किसानों के बीच भी असमंजस और अविश्वास की स्थिति बन गई है।भूपेश बघेल सरकार के समय सहकारी बैंकों में नियमित रूप से संचालक मंडल कार्यरत था, जिससे खरीदी प्रक्रिया में सुचारु व्यवस्था बनी रहती थी। मगर वर्तमान भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की उपेक्षा और प्रशासनिक उदासीनता के कारण अब तक न तो बैंकों में नयी समितियों का गठन हुआ है, न ही अध्यक्षों की नियुक्ति।विशेषज्ञों का मानना है कि सहकारी बैंकों के बिना धान खरीदी की प्रणाली में बड़ा संकट आ सकता है क्योंकि किसानों के भुगतान, उपार्जन केंद्रों की निगरानी और वित्तीय अनुशासन का पूरा तंत्र इन्हीं बैंकों के माध्यम से संचालित होता है। यदि जल्द ही इन नियुक्तियों पर फैसला नहीं हुआ, तो धान खरीदी की प्रक्रिया में अव्यवस्था, भुगतान में देरी और किसानों के आक्रोश जैसी स्थिति बनना तय है।राजनीतिक हलकों में यह चर्चा गर्म है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय आखिर इस महत्वपूर्ण विषय पर क्यों चुप हैं? क्या भाजपा सरकार के भीतर सहकारिता विभाग को लेकर रस्साकशी चल रही है या फिर सरकार की प्राथमिकताओं में किसानों का सवाल अब पीछे छूट गया है?फिलहाल, धान खरीदी का काउंटडाउन शुरू हो चुका है,लेकिन “सहकारी बैंक बिना नेतृत्व के” यह संकेत दे रहे हैं कि सरकार की तैयारी कागजों में है, ज़मीन पर नहीं।


