तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
राजस्व विभाग के अफसर अब भ्रष्टाचार के नए ‘मॉडल’ पर काम कर रहे हैं। बेगारी भी करेंगे और रिश्वत भी लेंगे! विभागीय सूत्रों का कहना है कि अब अधिकारियों की जेब से जो पैसा निकलता है, वो ‘सेवाभाव’ में ही गिना जाता है, क्योंकि हर माह राजधानी से लेकर जिले के बड़े अफसरों और नेताओं तक पहुंचाना पड़ता है ‘नजराना’।कहने को तो ये सेवा विभाग जनता की समस्याओं के समाधान के लिए बना है, पर सच्चाई यह है कि यहां फाइल तभी आगे बढ़ती है जब नोटों की गर्मी महसूस होती है। किसी भी जिले में अगर कोई मंत्री या वरिष्ठ अफसर का आगमन होता है, तो राजस्व विभाग को ‘सेवाभाव’ दिखाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। गाड़ियों की व्यवस्था से लेकर खानपान तक का खर्च विभागीय अधिकारी अपने ‘खर्चे’ से उठाते हैं। पर असली सवाल ये है कि जब अफसर खुद ‘बेगारी’ करने को मजबूर होंगे, तो आम जनता से ईमानदारी की उम्मीद कौन करेगा?जनता कहती है कि “राजस्व विभाग में काम नहीं होता, बस ‘सेवा’ के नाम पर हिसाब लिया जाता है! अब लगता है अब “सेवा भाव” की नई परिभाषा यही है ऊपर वालों को सेवा, नीचे वालों से वसूली!


