तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की विष्णु देव साय सरकार इन दिनों ऐसे राजनीतिक दबावों से जूझ रही है जिसने पूरे शासन-प्रशासन की रफ्तार को मानो थाम दिया है। चर्चाओं में यह बात खुलकर सामने आ रही है कि एक वरिष्ठ मंत्री के प्रभाव, विरोध और लगातार दबाव के कारण पूरा मंत्रिमंडल असहज स्थिति में है। इतना कि कई महत्वपूर्ण निर्णय महीनों से लटके पड़े हैं और मुख्यमंत्री तक अपनी टीम को अंतिम रूप नहीं दे पा रहे।विश्वस्त सूत्रों के अनुसार, इसी मंत्री के कारण अब तक मुख्यमंत्री विष्णु देव साय संसदीय सचिवों की नियुक्ति नहीं कर पाए हैं। इसके साथ ही शेष बचे निगम-मंडल, आयोग-बोर्ड, जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों, नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायतों में एल्डरमेन सहित दर्जनों संस्थाओं में नियुक्तियाँ भी रुकी हुई हैं।इन नियुक्तियों के स्थगित होने से शासन-प्रशासन की कार्यक्षमता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। कई विभागों में निर्णय प्रक्रिया अधर में अटकी है और नौकरशाही भी स्पष्ट दिशा के अभाव में असमंजस की स्थिति में है।बीते कैबिनेट बैठकों में कई महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव, विशेषकर किसानों और जनकल्याण से जुड़ी योजनाएँ ,एक मंत्री के विरोध के चलते आगे नहीं बढ़ पाए। यह स्थिति सरकार की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर सीधा आघात है।मंत्रालय के भीतर चर्चाएँ तेज हैं कि मंत्रिमंडल के कई सदस्य निर्णय लेने को उत्सुक हैं, परंतु “एक मंत्री की जिद” और अहंकार पूर्ण हस्तक्षेप के चलते सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय अपनी शांत और संतुलित कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियाँ उनके नेतृत्व के लिए नई चुनौती पेश कर रही हैं। मुख्य सचिव विकास शील और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी बार-बार यह संकेत दे रहे हैं कि यदि राजनीतिक खींचतान जारी रही तो शासन की विश्वसनीयता को नुकसान होगा। कई महत्वपूर्ण योजनाएँ और फैसले धीमी गति के शिकार हो चुके हैं, जिसका सीधा असर जनता पर पड़ रहा है।नियुक्तियाँ न होने के कारण नगर निगमों और नगर पंचायतों में विकास कार्यों की गति थमी हुई है। सहकारी बैंकों में बोर्ड के अभाव के चलते किसानों के कई वित्तीय कार्य लंबित पड़े हैं।विपक्ष खुलेआम आरोप लगा रहा है कि “छत्तीसगढ़ की सरकार एक मंत्री के आगे नतमस्तक है और इसी दबाव की राजनीति ने पूरे राज्य को ठप कर दिया है।”राजनीतिज्ञों का मानना है कि यदि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने जल्द ही मंत्रिमंडल के भीतर सामंजस्य स्थापित नहीं किया, और नियुक्तियों पर रोक लगाने वाली यह खींचतान जारी रही, तो सरकार आने वाले महीनों में और अधिक राजनीतिक नुकसान झेलेगी।सवाल यही है,क्या सरकार नेतृत्व की मजबूती दिखाते हुए सबको साथ लेकर चलने की दिशा में निर्णायक कदम उठाएगी, या फिर एक मंत्री की मनमानी ही छत्तीसगढ़ की राजनीति की दिशा तय करेगी? राज्य की राजनीति इस समय एक नाजुक मोड़ पर खड़ी है, जहां एक गलत कदम सरकार की नैया को डुबोने के लिए पर्याप्त है।


