तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
आज हमर छत्तीसगढ़ के महानदी भवन मंत्रालय के भीतर एक छोटी दिखई देय वाली घटना, पूरे छत्तीसगढ़िया मन मं गहिर प्रभाव छोड़ गे। एक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर, बड़े पद मं रहिके घलो अपन राज्य के पारंपरिक वेश-भूषा मं, पूरे गौरव के संग खड़े रहिन। ओला देखिके मन कहानीच खिल उठीस—जऊन समाज अपन संस्कृति ला भुलात जावत हे, उही जमाना मं एक बड़े अफसर अपन माटी के रंग मं रंगाय खड़े मिलन, ये बात सुघ्घर ताजगी देथे।पर संग-संग मन ला एक टीस घलो लगिस—जऊन काम हम सबो मन ला करना चाही, ओ काम आज एक अफसर हमन ला सिखावत हे।छत्तीसगढ़िया हमन, अउ हमर छत्तीसगढ़िया सरकार, धीरे-धीरे अपन भाखा-बोली, अपन खान-पान, अपन गम्मत, अपन पहिरावा ले दूर सरकत जावत हन। आधुनिकता के चमक-मिरमिरा मं अपन असली चिन्हारी धीरे-धीरे धुंधला होवत हे।सरकारी दफ्तर होवय, मंत्रियों के बैठक होवय, बड़े कार्यक्रम होवय—कोट-पैंट, इंग्लिश बोलचाल, अउ बाहरी चलन अपनावन ला “प्रतिष्ठा” समझे जावत हे। कोसा, लुगरा, फुलपाती, धोती-कुर्ता, और सरई-तनवार वाली परंपरा धीरे-धीरे कोने मं धकेल दी गे हे।फेर आज एक आईएएस अफसर याद दिलाइस—अपन पहिचान ला ओगारना पिछड़ापन नई, ओहीच असली प्रगति आय।माटी के गंध ले जुड़े रहना,अपन भाषा मं बोलना,अपन खान-पान ला सम्मान देना—ये सबो चीज मनखे ला भीतर ले मजबूत बनाथे। जऊन समाज अपन पहचान निसांधे, वो समाज के विकास घलो अधूरा रहिथे।हमर छत्तीसगढ़ियापन काकर भरोसा मं छोड़ देन? सरकार ला चाही के हमर लोक संस्कृति के रद्दा अउ चौड़ा करे, स्कूल-कॉलेज मं बोली-भाखा ला जादा बढ़ावा दे, सरकारी कार्यक्रम मं परंपरा ला स्थान दे, अऊ आम जनता त अपन घलो जिमीवारी समझव—काबर संस्कृति के जिम्मेदारी सिरिफ सरकार के नई, पूरा समाज के हे।आज वो आईएएस अफसर अपन चुपचाप खड़े रहिके घलो एक गहिर संदेश देके गीस— “जऊन मनखे अपन जड़ ला जिन्दा रखथे, ओहीच सबसे मजबूत पेड़ बनथे।” छत्तीसगढ़िया हमन दुनिया ला अपन संस्कृति ले पहिचान दे सकथन।बस जरूरत एहीच हे—अपन गांव, अपन बोली, अपन गीत, अपन पहिरावा, अपन सोहाई—इच हमर गौरव, अउ इच हमर पहचान।एक अफसर ले सीखव संगवारी—पद बड़े हो सकथे,पर माटी ले बड़े कभू नई होवय।


