तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राजभवन का नाम बदल देने से न तो जनता की तकदीर बदलेगी और न ही शासन-प्रशासन की कार्यसंस्कृति में कोई सुधार आएगा। आज जरूरत नाम की नहीं, जिम्मेदारी और जवाबदेही की है। राज्यपाल रमेन डेका हर जिले में एक मुख्यमंत्री की तरह समीक्षा बैठक तो ले रहे हैं, परंतु जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। समीक्षा बैठकों के कैमरों में कैद होने वाली तस्वीर और आम जनता की परेशानी झेलती जिंदगी—दोनों के बीच की दूरी आज भी उतनी ही चौड़ी है, जितनी पहले थी।वास्तविक स्थिति यह है कि स्वयं राज्यपाल सचिवालय में हजारों आवेदन महीनों से लंबित पड़े हुए हैं। लोगों की उम्मीदें फाइलों की धूल में दबी पड़ी हैं और उनका समाधान टेलीफोनिक निर्देशों तथा औपचारिक पत्राचार के भरोसे छोड़ दिया गया है। संबंधित विभागों को केवल एक औपचारिक खत भेजने भर से न तो किसी पीड़ित को न्याय मिलता है, न ही उसकी समस्या हल होती है। आमजन आज भी उसी स्थान पर खड़ा है जहाँ सालों से खड़ा रहा—व्यवस्था की उदासीनता और प्रशासनिक निष्क्रियता के ठीक सामने।राज्यपाल की समीक्षा बैठकों का उद्देश्य यदि वास्तव में जनता की तकलीफों का समाधान करना है, तो सबसे पहले सचिवालय की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और तत्परता लानी होगी। लंबित आवेदनों की संख्या घटाना, सुनवाई की प्रक्रिया समयबद्ध करना और विभागों को कठोर जवाबदेही के दायरे में लाना जरूरी है। समीक्षा बैठकें तभी सार्थक होंगी जब उनका असर लोगों के जीवन में दिखाई दे—कागजों पर नहीं, धरातल पर।आज जनता को नाम नहीं, काम चाहिए। पदों की गरिमा तब ही बढ़ेगी जब वे जनता की उम्मीदों का बोझ उठाएँगे, न कि उससे मुँह मोड़ लें। शासन की असली पहचान उसके नामों से नहीं, बल्कि जनता के प्रति उसकी संवेदनशीलता, तत्परता और प्रभावी कार्यवाही से बनती है। राजभवन का नाम बदलने से पहले वहाँ बैठे लोग अपनी भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करें, तभी जनता को विश्वास होगा कि परिवर्तन केवल औपचारिक नहीं, वास्तविक है।


