जंगल सुरक्षा के नाम पर ‘लूट का जंगलराज’! मरवाही वनमंडल में करोड़ों का खेल, ईओडब्ल्यू जांच की मांग तेज।

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

बिलासपुर संभाग अंर्तगत गौरेला-पेण्ड्रा- मरवाही जिले के मरवाही वनमंडल में जंगल सुरक्षा और विकास के नाम पर गठित वन प्रबंधन समितियां अब गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में हैं, जहां पिछले 5 से 6 वर्षों से समितियों के खातों में जमा सुरक्षा राशि को अधिकारियों, कर्मचारियों और समिति सचिवों की मिलीभगत से योजनाबद्ध तरीके से हड़पने का मामला सामने आ रहा है। विभागीय सूत्रों के अनुसार वर्ष 2020 से लगातार फर्जी प्रस्ताव तैयार कर करोड़ों रुपए की राशि आहरित की गई, जिसमें आस्थामूलक कार्य, फेंसिंग मरम्मत और मजदूरी भुगतान जैसे मदों का सहारा लिया गया, जबकि जमीनी स्तर पर अधिकांश कार्य केवल कागजों में ही सीमित रहे।आरोप है कि इस पूरे खेल में व्यय- शाखा प्रभारियों की भूमिका संदिग्ध है, जो समिति सचिवों के साथ मिलकर फर्जी प्रस्तावों को मंजूरी दिलवाते रहे। बताया जाता है कि समिति सचिवों द्वारा अध्यक्ष के फर्जी हस्ताक्षर कर प्रस्ताव तैयार किए जाते थे और इन्हें वनमंडल कार्यालय में प्रस्तुत कर आसानी से स्वीकृति प्राप्त कर ली जाती थी, जिसके बाद मजदूरी के नाम पर राशि चहेते लोगों के खातों में ट्रांसफर कर निकाल ली जाती थी, वहीं सामग्री क्रय के नाम पर भी फर्जी फर्मों के जरिए राशि आहरित कर आपस में बांट ली जाती थी।इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि शाखा प्रभारी पिछले 5 वर्षों से मुख्य लिपिक के साथ-साथ व्यय- शाखा की प्रभारी बनी हुई हैं, और आरोप है कि इसी दौरान उन्होंने अवैध रूप से भारी संपत्ति अर्जित कर ली तथा अपने प्रभाव के चलते विभागीय स्तर पर कार्रवाई से बचती रही हैं। विभागीय सूत्रों का कहना है कि लंबे समय से एक ही पद पर जमे रहने के कारण पूरे तंत्र में पारदर्शिता खत्म हो गई और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला।मरवाही वनमंडल में सामने आए इस कथित घोटाले को लेकर अब आम जनता और जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश है, और उन्होंने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) से कराने तथा दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है। विभागीय कर्मचारियों का स्पष्ट कहना है कि जंगल सुरक्षा जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं को ही भ्रष्टाचार का जरिया बना दिया गया है, जिससे शासन की मंशा पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।इस पूरे प्रकरण ने अब प्रदेश के वन महकमे के शीर्ष स्तर को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है, जहां वन मंत्री केदार कश्यप, वन विभाग की अपर मुख्य सचिव ऋचा शर्मा और पीसीसीएफ व्ही श्रीनिवास राव की भूमिका और जिम्मेदारी पर सवाल उठने लगे हैं कि आखिर इतने वर्षों तक करोड़ों के इस कथित घोटाले पर रोक क्यों नहीं लग पाई।अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इस गंभीर मामले को संज्ञान में लेकर निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई करेगी, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।


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