तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ में सुशासन और पारदर्शिता के दावों के बीच एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सीधे तौर पर मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग से जुड़ा यह प्रकरण अब एक उदाहरण बन चुका है कि किस तरह उच्च स्तर से जारी आदेश भी सिस्टम की उदासीनता की भेंट चढ़ रहे हैं।प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय से जारी पत्र में स्पष्ट रूप से चार महत्वपूर्ण पत्र क्रमांकों—ESTB-1/2915/2025 (31.12.2025), FINACC/158/2026-FOREST2 (08.01.2026), ESTB-10241(1)/69/2026 (29.01.2026) और कार्यालयीन पत्र क्रमांक 316420 (14.01.2026)—का उल्लेख किया गया है। इन पत्रों के माध्यम से करोड़ों रुपये की गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की शिकायतों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई थी।मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य सचिव विकास शील के निर्देश पर अपर मुख्य सचिव ऋचा शर्मा को एक महीने के भीतर निष्पक्ष जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया था। लेकिन चार महीने बीत जाने के बाद भी जांच का कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।यहां सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री सचिवालय की भूमिका पर उठता है। क्योंकि इस पूरे प्रकरण में बार-बार मुख्यमंत्री सचिवालय को पत्र सौंपे गए। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उनके प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह और सचिव पी. दयानंद के नाम पर दर्जनों आवेदन दिए गए, लेकिन इन पत्रों को जिस तरह से नजरअंदाज किया गया, वह सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करता है।अगर मुख्यमंत्री सचिवालय ही शिकायतों को प्राथमिकता नहीं देगा, तो फिर आम जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए कहां जाएगी? सचिवालय का काम केवल पत्र प्राप्त करना नहीं, बल्कि उन पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना भी है। लेकिन वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि कई मामलों में पत्र केवल “रसीद” बनकर रह जाते हैं और आगे की प्रक्रिया ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है।वन विभाग का यह मामला महज एक उदाहरण है, लेकिन यह पूरे प्रशासनिक ढांचे की कार्यशैली को उजागर करता है। सवाल यह है कि जब मुख्य सचिव स्तर से आदेश जारी हो चुके हैं, तब भी फाइलें आगे क्यों नहीं बढ़तीं? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को किसी प्रकार का भय या जवाबदेही नहीं है?सरकार की छवि पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। एक ओर मुख्यमंत्री सुशासन तिहार जैसे अभियानों के माध्यम से जनता की समस्याओं के समाधान का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर सचिवालय में लंबित पड़े ऐसे मामलों से यह संदेश जाता है कि जमीनी हकीकत कुछ और ही है।यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही के संकट की ओर इशारा करती है। यदि समयबद्ध जांच के आदेशों का भी पालन नहीं हो रहा है, तो यह स्पष्ट है कि सिस्टम में कहीं न कहीं जवाबदेही तय करने की व्यवस्था कमजोर पड़ चुकी है।अब आवश्यकता इस बात की है कि मुख्यमंत्री सचिवालय खुद इस मामले का संज्ञान ले और यह स्पष्ट करे कि आखिर चार महीने बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। साथ ही, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय कर कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों में आदेश केवल कागजों तक सीमित न रह जाएं।अन्यथा, “सुशासन” केवल एक नारा बनकर रह जाएगा और जनता का भरोसा धीरे-धीरे सिस्टम से उठता चला जाएगा।