तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मुख्यमंत्री सचिवालय से जारी पत्रों और लोक शिक्षण संचालनालय की फाइलों के आधार पर यह साफ संकेत मिल रहा है कि उच्च स्तर से दिए गए निर्देश भी जमीन पर दम तोड़ रहे हैं। मामला दो व्याख्याताओं के स्थानांतरण/प्रतिनियुक्ति से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी समस्याओं को लेकर एक-दो नहीं बल्कि दर्जनभर से ज्यादा बार मुख्यमंत्री सचिवालय के जिम्मेदार अफसरों के समक्ष गुहार लगाई, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला।दस्तावेज बताते हैं कि मुख्यमंत्री सचिवालय से 20 अप्रैल 2026 को जारी पत्र में स्पष्ट रूप से संबंधित विभाग को निर्देशित किया गया कि आवेदिका के स्थानांतरण के मामले में नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की जाए। यह पत्र अवर सचिव के हस्ताक्षर से स्कूल शिक्षा विभाग को भेजा गया। वहीं, इससे पहले लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा भी स्थानांतरण/प्रतिनियुक्ति प्रस्ताव भेजे जाने की प्रक्रिया पूरी की जा चुकी थी।लेकिन हैरानी की बात यह है कि हाल ही में जारी 186 व्याख्याताओं की स्थानांतरण/प्रतिनियुक्ति सूची में इन दोनों व्याख्याताओं का नाम गायब है। सवाल यह उठता है कि जब मुख्यमंत्री सचिवालय खुद संज्ञान लेकर पत्राचार कर रहा है, तो फिर इन निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा?सूत्रों के मुताबिक, स्कूल शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि “स्थानांतरण/प्रतिनियुक्ति केवल शिक्षा मंत्री की सहमति से ही संभव है।” यहां तक कि अंदरखाने यह भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री का निर्देश भी तब तक प्रभावी नहीं होता, जब तक विभागीय मंत्री की मंजूरी न हो।यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव की ओर इशारा करता है। यदि विभागीय मंत्री की सहमति के बिना मुख्यमंत्री के निर्देश भी निष्प्रभावी हैं, तो फिर मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा जारी ये पत्र आखिर किस उद्देश्य से भेजे जा रहे हैं?आरोप सीधे तौर पर मुख्यमंत्री सचिवालय के शीर्ष अफसरों—प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह, सचिव पी. दयानंद और एस. बसवराजू—पर लग रहे हैं कि वे सिर्फ औपचारिकता निभाने के लिए पत्र जारी कर रहे हैं। पीड़ित व्याख्याताओं का कहना है कि उन्हें बार-बार बुलाकर आश्वासन दिया गया, ज्ञापन लिए गए, लेकिन फाइल आगे बढ़ाने के नाम पर केवल “कागजी कार्रवाई” ही होती रही।एक व्याख्याता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमने अपनी समस्या को लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक कई बार गुहार लगाई। हर बार हमें भरोसा दिलाया गया कि जल्द समाधान होगा, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। अब तो ऐसा लगता है कि ये चिट्ठियाँ सिर्फ दिखावे के लिए लिखी जाती हैं।”इस पूरे प्रकरण ने राज्य की प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या मुख्यमंत्री सचिवालय केवल पत्र भेजकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है? क्या विभागीय स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप इतना हावी है कि शीर्ष स्तर के निर्देश भी बेअसर हो जाते हैं?सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर आम कर्मचारी और शिक्षक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए मुख्यमंत्री तक पहुंचने के बाद भी न्याय नहीं पा रहे, तो फिर वे किस पर भरोसा करें?यह मामला अब केवल दो व्याख्याताओं का नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह बन चुका है। जरूरत इस बात की है कि मुख्यमंत्री स्वयं इस प्रकरण में हस्तक्षेप कर स्पष्ट करें कि उनके सचिवालय से जारी आदेशों की वास्तविक अहमियत क्या है—क्या ये सच में समाधान के लिए होते हैं, या फिर सिर्फ कागजों में खानापूर्ति के लिए?