सत्ता, समन्वय और प्रशासनिक संतुलन : मुख्य सचिव विकास शील की भूमिका पर गहराता विमर्श..!

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तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक संरचना इन दिनों केवल शासन संचालन का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह सत्ता, समन्वय और संस्थागत संतुलन के एक गंभीर अध्ययन का केंद्र बनती जा रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में सरकार अपने प्रशासनिक ढाँचे को तेज, नियंत्रित और परिणामोन्मुख बनाने की दिशा में लगातार सक्रिय दिखाई दे रही है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री सचिवालय की भूमिका भी पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली और संगठित होकर उभरी है।मुख्यमंत्री सचिवालय में प्रमुख सचिव सुबोध कुमार सिंह की सक्रियता और प्रभाव को प्रशासनिक गलियारों में विशेष रूप से देखा जा रहा है। उनके साथ मुख्यमंत्री के सचिव के रूप में पी.दयानंद, मुकेश बंसल तथा वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी राहुल भगत सहित कई अधिकारी मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली को मजबूत और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री सचिवालय अब केवल एक पारंपरिक कार्यालय न रहकर शासन संचालन का अत्यंत सक्रिय और रणनीतिक केंद्र बन चुका है।इसी पृष्ठभूमि में राज्य के मुख्य सचिव विकास शील की भूमिका को लेकर गंभीर विमर्श सामने आ रहा है। सवाल यह नहीं है कि कौन अधिक प्रभावशाली है, बल्कि यह है कि राज्य की प्रशासनिक संरचना में मुख्य सचिव की संवैधानिक और संस्थागत भूमिका किस प्रकार और कितनी प्रभावी दिखाई देनी चाहिए।भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में मुख्य सचिव को राज्य शासन का सर्वोच्च समन्वयक माना जाता है। मुख्यमंत्री राजनीतिक नेतृत्व देते हैं, मुख्यमंत्री सचिवालय शासन की प्राथमिकताओं को गति देता है, लेकिन संपूर्ण नौकरशाही के बीच संतुलन, अनुशासन, निष्पक्षता और संस्थागत संवाद बनाए रखने की केंद्रीय जिम्मेदारी मुख्य सचिव के कंधों पर होती है।छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, जहाँ नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से लेकर औद्योगिक निवेश, ऊर्जा प्रबंधन, आदिवासी विकास, ग्रामीण प्रशासन और सामाजिक योजनाओं तक अनेक संवेदनशील विषय समानांतर रूप से संचालित होते हैं। ऐसे में यदि मुख्यमंत्री सचिवालय अत्यधिक सक्रिय और निर्णय केंद्रित भूमिका में दिखाई देता है, तो मुख्य सचिव की भूमिका स्वाभाविक रूप से “संतुलनकारी शक्ति” के रूप में और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्य सचिव को केवल विभागीय बैठकों और फाइल प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शासन का प्रत्येक निर्णय व्यापक प्रशासनिक सहभागिता और संस्थागत संवाद के माध्यम से लागू हो। वरिष्ठ अधिकारियों के बीच विश्वास कायम रखना, विभागों के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय समन्वय बनाना और जिलों तक प्रशासनिक स्पष्टता पहुँचाना भी उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मानी जाती है।मुख्यमंत्री सचिवालय में सुबोध कुमार सिंह और उनकी टीम की सक्रियता को शासन की कार्यक्षमता के दृष्टिकोण से सकारात्मक रूप में भी देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आज के दौर में मुख्यमंत्री कार्यालय का मजबूत होना लगभग हर राज्य की प्रशासनिक आवश्यकता बन चुका है। तेज निर्णय, त्वरित मॉनिटरिंग और प्रत्यक्ष समीक्षा की संस्कृति ने सीएमओ आधारित प्रशासन को नई पहचान दी है। लेकिन इसके समानांतर यह भी आवश्यक माना जाता है कि मुख्य सचिव का कार्यालय पूरी प्रशासनिक संरचना के लिए “न्यूट्रल एंकर” बना रहे।विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि यदि किसी राज्य में प्रशासनिक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण एक ही कार्यालय में दिखाई देने लगे, तो धीरे-धीरे विभागीय स्वतंत्रता और संस्थागत संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए मुख्य सचिव की सक्रिय और संतुलित उपस्थिति शासन की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए आवश्यक मानी जाती है।मुख्य सचिव विकास शील के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती यही मानी जा रही है कि वे मुख्यमंत्री की प्राथमिकताओं, मुख्यमंत्री सचिवालय की कार्यशैली और पूरी नौकरशाही के बीच बेहतर सामंजस्य स्थापित करें। उन्हें एक ऐसे समन्वयक की भूमिका निभानी होगी जो न केवल शासन की गति बनाए रखे, बल्कि प्रशासनिक संस्थाओं की गरिमा और संतुलन को भी मजबूत करे।राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार छत्तीसगढ़ की वर्तमान प्रशासनिक परिस्थिति किसी टकराव की नहीं, बल्कि भूमिकाओं के पुनर्संतुलन की स्थिति है। मुख्यमंत्री कार्यालय की सक्रियता और मुख्य सचिवालय की संस्थागत भूमिका यदि समानांतर रूप से मजबूत रहती है, तो शासन अधिक प्रभावी और स्थिर बन सकता है।अंततः लोकतांत्रिक प्रशासन की सफलता इसी में मानी जाती है कि राजनीतिक नेतृत्व निर्णायक हो, मुख्यमंत्री सचिवालय रणनीतिक रूप से सक्षम हो और मुख्य सचिव पूरी प्रशासनिक मशीनरी को संतुलित, समन्वित और जवाबदेह ढंग से संचालित करने वाली केंद्रीय धुरी बने। छत्तीसगढ़ में इस समय यही बहस सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक विमर्श के रूप में उभरती दिखाई दे रही है।


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