तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों एक ऐसे विरोधाभास से गुजर रही है, जिस पर अब गंभीर चर्चा शुरू हो चुकी है। एक ओर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के काफिले के लिए हाल ही में नई सरकारी स्कॉर्पियो वाहनों की खरीदी की गई है, जिन पर बाकायदा सरकारी सीरीज नंबर अंकित हैं। वहीं दूसरी ओर प्रदेश के अनेक जिलों में जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी और नगर निगम आयुक्त जैसे शीर्ष अधिकारी निजी सीरीज नंबर वाले अथवा किराए के वाहनों में सफर करते दिखाई दे रहे हैं।यह स्थिति अब केवल “सुविधा” का विषय नहीं रह गई है, बल्कि सरकारी वित्तीय अनुशासन, प्रशासनिक पारदर्शिता और राजस्व प्रबंधन पर बड़ा प्रश्नचिह्न बनती जा रही है।राज्य के कई जिलों में देखा जा रहा है कि प्रशासनिक अधिकारियों के उपयोग में आने वाली गाड़ियां या तो निजी नंबर सीरीज की हैं अथवा लंबे समय से किराए पर संचालित हो रही हैं। इन वाहनों के भुगतान के लिए हर महीने लाखों रुपए सरकारी खजाने से खर्च किए जा रहे हैं। यदि पूरे प्रदेश का आंकड़ा निकाला जाए तो यह राशि करोड़ों में पहुंचती दिखाई देती है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार स्थायी रूप से सरकारी वाहन खरीद सकती है, तब वर्षों तक किराए के वाहनों पर निर्भरता क्यों बनी हुई है? प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी है कि कई जिलों में वाहन किराया व्यवस्था एक “स्थायी व्यवस्था” का रूप ले चुकी है, जहां हर माह भारी भुगतान नियमित रूप से जारी रहता है।वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार एकमुश्त राशि खर्च कर सरकारी वाहन खरीदे तो पांच से सात वर्षों तक उनका उपयोग किया जा सकता है। इसके विपरीत किराए की व्यवस्था में लगातार भुगतान होता रहता है, जिससे लंबे समय में सरकारी खजाने पर अत्यधिक बोझ पड़ता है।कई जिलों में अधिकारियों के लिए उपयोग किए जा रहे वाहन हाई एंड एसयूवी श्रेणी के बताए जाते हैं। इन वाहनों का मासिक किराया, डीजल, मेंटेनेंस और ड्राइवर भुगतान जोड़ दिया जाए तो प्रति वाहन खर्च काफी बड़ा हो जाता है। यही कारण है कि अब यह बहस तेज हो रही है कि आखिर सरकार स्थायी परिसंपत्ति निर्माण की बजाय अस्थायी किराया मॉडल पर क्यों निर्भर है।प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि सरकारी वाहन केवल परिवहन का साधन नहीं होते, बल्कि वे शासन की पहचान और जवाबदेही का प्रतीक भी माने जाते हैं। सरकारी नंबर प्लेट वाली गाड़ियां सीधे तौर पर यह दर्शाती हैं कि वाहन राज्य संपत्ति है और उसका उपयोग नियमों के अधीन हो रहा है। जबकि निजी नंबर वाहनों के उपयोग से पारदर्शिता को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगते हैं।कुछ पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों का यह भी मत है कि किराए की गाड़ियों के माध्यम से कई बार अनावश्यक वित्तीय व्यय की संभावना बढ़ जाती है। वाहन अनुबंध, भुगतान प्रक्रिया और चयन प्रणाली में पारदर्शिता की कमी होने पर यह पूरा मॉडल विवाद का कारण बन सकता है।ग्रामीण क्षेत्रों में पदस्थ अधिकारियों के लगातार दौरे को देखते हुए वाहन व्यवस्था की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सरकार के पास अपना मजबूत वाहन बेड़ा विकसित करने की कोई दीर्घकालिक नीति है? यदि नहीं, तो हर वर्ष करोड़ों रुपए किराए के नाम पर खर्च करना आखिर किस प्रशासनिक सोच को दर्शाता है?मुख्यमंत्री Vishnu Deo Sai द्वारा अपने काफिले के लिए सरकारी स्कॉर्पियो खरीदे जाने को कई लोग एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि यदि शीर्ष स्तर पर सरकारी वाहन उपयोग को प्राथमिकता दी जा रही है, तो यही मॉडल जिलों तक भी लागू होना चाहिए।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य सरकार यदि इस विषय पर व्यापक समीक्षा करे तो करोड़ों रुपए की बचत संभव हो सकती है। साथ ही सरकारी वाहनों के केंद्रीकृत प्रबंधन, एकीकृत खरीद नीति और पुराने वाहनों के व्यवस्थित नवीनीकरण से प्रशासनिक खर्च में बड़ी कमी लाई जा सकती है।इस पूरे मुद्दे का दूसरा पक्ष यह भी है कि कई विभागों में वर्षों से नए वाहन खरीदे ही नहीं गए। परिणामस्वरूप अधिकारी किराए के वाहनों पर निर्भर हो गए। लेकिन अब जब राज्य में सुशासन, पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन की बात प्रमुखता से उठ रही है, तब वाहन व्यवस्था की समीक्षा भी उतनी ही आवश्यक मानी जा रही है।जनता के बीच भी यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि आखिर सरकारी अधिकारियों के लिए सरकारी वाहन व्यवस्था क्यों कमजोर होती जा रही है। आम नागरिकों का सवाल है कि यदि सरकारी विभाग स्थायी संपत्ति निर्माण के बजाय लगातार किराया मॉडल पर चलते रहे, तो सरकारी राजस्व पर उसका प्रभाव स्वाभाविक रूप से दिखाई देगा।विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि भविष्य में ई-वाहन आधारित सरकारी फ्लीट विकसित कर सरकार खर्च घटाने के साथ-साथ पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में भी बड़ा कदम उठा सकती है।फिलहाल यह मुद्दा प्रशासनिक गलियारों से निकलकर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या राज्य सरकार जिलों में निजी सीरीज और किराए के वाहनों के उपयोग पर कोई व्यापक नीति बनाएगी, या फिर यह व्यवस्था आने वाले वर्षों में भी ऐसे ही जारी रहेगी।