तरुण कौशिक, संपादक सर्वव्यापी

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा शुक्रवार को जारी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों के तबादला आदेश ने प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। आदेश केवल पदस्थापना का मामला नहीं रह गया है, बल्कि अब यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या सरकार कुछ अधिकारियों के साथ न्याय कर रही है और कुछ को व्यवस्थित रूप से किनारे लगाया जा रहा है?ताजा आदेश में वर्ष 2012 बैच की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी पुष्पा साहू को पुनः सचिव, माध्यमिक शिक्षा मंडल के पद पर बनाए रखा गया है। जबकि 6 मई को जारी आदेश में उन्हें कोरिया जिले का कलेक्टर नियुक्त किया गया था। तीन दिन के भीतर ही आदेश में संशोधन कर दिया गया। यह बदलाव प्रशासनिक स्थिरता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां बनीं कि सरकार को अपने ही आदेश में इतनी जल्दी संशोधन करना पड़ा? यदि पुष्पा साहू को कलेक्टर बनाने का निर्णय सही था, तो फिर उसे वापस क्यों लिया गया? और यदि उन्हें शिक्षा मंडल में ही रखना था, तो फिर पहले आदेश जारी करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी, जिनके पास प्रशासनिक अनुभव और जमीनी समझ दोनों हैं, उन्हें जिले की जिम्मेदारी देकर वापस लेना क्या उनके अधिकार और क्षमता पर अविश्वास का संकेत नहीं माना जाएगा?इसी तरह वर्ष 2018 बैच के आईएएस अधिकारी संबित मिश्रा के मामले ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बीजापुर जैसे संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण जिले में कलेक्टर के रूप में कार्य कर चुके अधिकारी को अचानक नगर निगम रायपुर का आयुक्त बना देना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया भर नहीं माना जा रहा।बीजापुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र है, जहां काम करना किसी भी अधिकारी के लिए आसान नहीं होता। ऐसे जिले में काम करने वाले अधिकारी को सामान्यतः अधिक बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी या राज्य स्तर पर रणनीतिक भूमिका दी जाती है। लेकिन संबित मिश्रा को नगर निगम भेजे जाने को कई लोग “डिमोशन जैसी प्रशासनिक मानसिकता” के रूप में देख रहे हैं।प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या अब छत्तीसगढ़ में जिला कलेक्टर का पद भी स्थायी सम्मानजनक प्रशासनिक पद नहीं रह गया है? यदि एक अधिकारी दुर्गम क्षेत्र में काम करके आता है और उसके बाद उसे सीधे नगर निगम में भेज दिया जाता है, तो यह संदेश बाकी अधिकारियों तक क्या जाएगा?दूसरी ओर वर्ष 2016 बैच की आईएएस अधिकारी रोक्तिमा यादव को कोरिया जिले का नया कलेक्टर बनाया गया है। वहीं वर्ष 2019 बैच की आईएएस अधिकारी रीता यादव को आयुक्त, उच्च शिक्षा तथा राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA) का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।इन नियुक्तियों को लेकर प्रशासनिक वर्ग में यह धारणा भी बन रही है कि सरकार अब योग्यता, अनुभव और प्रशासनिक निरंतरता से अधिक “आंतरिक समीकरणों” के आधार पर फैसले ले रही है। लगातार आदेश बदलना और अधिकारियों के दायित्वों में अचानक फेरबदल करना शासन की निर्णय प्रक्रिया को कमजोर दिखाता है।सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सरकार के भीतर क्या अब एक समान प्रशासनिक नीति बची भी है? एक अधिकारी को आदेश जारी कर कलेक्टर बनाया जाता है और तीन दिन बाद वही आदेश बदल दिया जाता है। दूसरे अधिकारी को कठिन जिले से हटाकर ऐसे पद पर भेजा जाता है जिसे कई लोग तुलनात्मक रूप से कम प्रभावशाली मानते हैं। यह केवल तबादला नहीं, बल्कि प्रशासनिक मनोबल से जुड़ा विषय बन चुका है।विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रशासनिक सेवा में पारदर्शिता, स्थिरता और सम्मान सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। यदि अधिकारी स्वयं को असुरक्षित और अस्थिर महसूस करेंगे, तो उसका सीधा असर शासन व्यवस्था और जनता तक पहुंचेगा।अब सबसे बड़ा सवाल मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और सरकार की प्रशासनिक रणनीति पर उठ रहा है। क्या सरकार के पास स्पष्ट प्रशासनिक दृष्टि है या फिर निर्णय दबाव, लॉबिंग और आंतरिक शक्ति संतुलन के आधार पर लिए जा रहे हैं?छत्तीसगढ़ की जनता अब यह जानना चाहती है कि आखिर प्रशासनिक फेरबदल का वास्तविक आधार क्या है — योग्यता, अनुभव और जनसेवा, या फिर सत्ता के भीतर चल रही अदृश्य पसंद-नापसंद की राजनीति?