विकास नंद/ सर्वव्यापी
तोषगाँव में बैठकी कीर्तन अपने समापन की ओर था। संध्या लगभग पाँच बजे की रही होगी। नगर कीर्तन प्रारंभ होने में अभी थोड़ा समय था। इसी बीच स्कूल के पुराने दोस्त एक जगह मिले और बातों का सिलसिला शुरू हुआ। चर्चा करते-करते अचानक सबकी यादें उस पुराने स्कूल तक पहुँच गईं, जहाँ कभी हम सबने साथ पढ़ाई की थी और आज वहीं भंडारे का आयोजन होता है।
बचपन की शरारतें, गुरुजनों की डाँट, मित्रों की हँसी और पढ़ाई के वे दिन — सब जैसे आँखों के सामने तैरने लगे। किसी ने कहा, “क्यों ना आज किसी गुरुजी के दर्शन कर आएँ?” बस फिर क्या था। जैसे गर्मी के दिनों में तालाब से नहा चुका साथी भी दोस्तों के आग्रह पर दोबारा पानी में उतर जाता था, वैसे ही प्रशांत भोई, डोलामणि भोई, पुरुषोत्तम डनसना, जयंत सतपथी और सुरेश साहू तुरंत तैयार हो गए।रास्ते में विचार आया कि गुरुजी के घर खाली हाथ जाना उचित नहीं होगा। कुछ लेने के लिए दुकान पर रुके ही थे कि अचानक भूगोल की वह प्रसिद्ध कक्षा याद आ गई। आर.एस. प्रधान गुरुजी आम का उदाहरण देकर पढ़ाया करते थे। वे कहते थे —“अंग्रेज जब भारत आकर आम खाते थे तो उसके स्वाद को इस तरह बताते थे, मानो दाढ़ी को चाशनी में डुबोकर चूस रहे हों।”उनका यह उदाहरण केवल एक वाक्य नहीं था, बल्कि उनकी अद्भुत शिक्षण कला का परिचय था। उस दौर में पढ़ाई बोझ नहीं लगती थी। खेल-खेल में शिक्षा, मनोरंजन के साथ पाठन और अनुशासन को डर नहीं बल्कि आदत बनाकर सिखाने की कला हमारे गुरुजनों में थी।
जब हम सब आर.एस. प्रधान गुरुजी के नए घर पहुँचे तो मन में था कि थोड़ी देर मिलकर वापस नगर कीर्तन देखने लौट जाएँगे। लेकिन जैसे गर्मी में तालाब से बाहर निकलने का मन नहीं करता, वैसे ही गुरुजी के साथ बातचीत का सिलसिला ऐसा चला कि समय का पता ही नहीं चला।
गुरुजी अब लगभग 75 वर्ष के हो चुके हैं, परंतु व्यक्तित्व आज भी वैसा ही ऊर्जावान और प्रभावशाली लगा। वही मुस्कान, वही बोलने की शैली और वही रोचक अंदाज। हम सब जैसे फिर से अपनी भूगोल की कक्षा में पहुँच गए थे। बातचीत के दौरान गुरुजी ने पुराने सहपाठियों की कई दिलचस्प घटनाएँ सुनाईं, जिनमें शिक्षा भी थी और मनोरंजन भी।
हम सबने हँसते हुए पूछा —“गुरुजी, आप आज भी इतने स्वस्थ और युवा कैसे दिखते हैं?”गुरुजी मुस्कुराए और बोले —“नियमित दिनचर्या, व्यायाम, योग, संतुलित खानपान और सबसे बड़ी बात — लोगों से मिलना-जुलना। लेकिन शिष्यों से मिलना सबसे बड़ा विटामिन है। जब पुराने विद्यार्थी मिलने आते हैं तो वही पल हमें फिर से जवान बना देता है। यही तो हमारी असली पूँजी है।”उनकी यह बात सीधे हृदय में उतर गई। सचमुच, शिक्षक केवल किताबों का ज्ञान नहीं देते, वे जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।
वर्षों बाद जब शिष्य अपने गुरु से मिलते हैं, तो वह केवल मुलाकात नहीं होती — वह संस्कारों, स्मृतियों और आत्मीयता का पुनर्मिलन होता है।उस दिन महसूस हुआ कि विद्यालय केवल एक भवन नहीं होता और शिक्षक केवल नौकरी करने वाले व्यक्ति नहीं होते। वे हमारे जीवन की नींव होते हैं।
आज हम सब अपने-अपने जीवन में जो भी हैं, उसमें गुरुजनों के आशीर्वाद, मार्गदर्शन और शिक्षा का अमूल्य योगदान है।तोषगाँव की उस शाम ने यह अहसास फिर से जीवित कर दिया कि समय भले आगे बढ़ जाए, पर गुरु और शिष्य का संबंध कभी पुराना नहीं होता।