के.एस. ठाकुर/ कार्यकारी संपादक /सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग में अध्यक्ष पद को लेकर एक बार फिर सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। सूत्रों के अनुसार, हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज चंद्रभूषण बाजपेई का नाम इस पद के लिए सबसे आगे चल रहा है।लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या आयोग की कमान हर बार की तरह फिर किसी उम्रदराज़, सेवानिवृत्त अधिकारी या जाति विशेष से जुड़े व्यक्ति को ही दी जाएगी?अब तक आयोग की यही परंपरा रही है और इसका खामियाजा भाषा विकास के ठहराव के रूप में सामने आता रहा है।मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष किरण सिंह देव ने संगठन से लेकर मंत्रिमंडल विस्तार तक युवाओं को तरजीह दी है। लेकिन राजभाषा आयोग में क्या यह परंपरा टूटेगी या फिर फिर वही पुराना ढर्रा चलेगा? यह अब सबसे अहम सवाल बन गया है।भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ी और अन्य बोलियों को नई सोच, ऊर्जा और सक्रिय नेतृत्व की ज़रूरत है, लेकिन आयोग की कार्यशैली अब तक बंधी-बंधाई परंपराओं की कैदी रही है।वहीं अगर सरकार की मंशा सेवानिवृत्त और खासकर ब्राह्मण समाज से ही अध्यक्ष चुनने की है, तो बिलासपुर जिले के बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला के बड़े पिताजी, 84 वर्षीय नंदकिशोर शुक्ल का नाम सबसे न्यायसंगत विकल्प हो सकता है।क्योंकि नंदकिशोर शुक्ल जीवनभर छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए संघर्ष और जन आंदोलन से जुड़े रहे हैं और आज भी पूर्णतः समर्पित हैं।ऐसे में सवाल सीधा है कि,क्या भाजपा सरकार युवाओं को प्रतिनिधित्व देगी या फिर आयोग परंपरागत सोच और जातिगत समीकरणों का शिकार बनेगा?