तरुण कौशिक/संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ की राजनीति इन दिनों असामान्य दौर से गुजर रही है। विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाय कांग्रेस पार्टी केवल ईडी और सीबीआई की कार्यवाहियों पर बयानबाज़ी तक सिमट गई है। जनता से जुड़े मुद्दों—महंगाई, किसानों की परेशानियां, बेरोजगारी, और कानून-व्यवस्था—पर विपक्ष का अपेक्षित आक्रामक रुख नदारद है।
नतीजा यह है कि सदन में सत्ता पक्ष को घेरने का जो काम कांग्रेस को करना चाहिए था, वह अब भाजपा के ही वरिष्ठ विधायक करते दिख रहे हैं।
मंत्रिमंडल विस्तार से असंतोष हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार ने भाजपा संगठन के भीतर असंतोष की नई लहर पैदा कर दी है।
पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर, वरिष्ठ विधायक बृजमोहन अग्रवाल और विपक्ष के पूर्व नेता रह चुके नारायण चंदेल जैसे दिग्गज विधायकों को दरकिनार किया गया।
इन नेताओं की लंबे समय से अपेक्षा थी कि उन्हें मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलेगी, लेकिन नए चेहरों और संगठन के निकट माने जाने वाले विधायकों को वरीयता दी गई। इससे उपेक्षित विधायकों में गहरी नाराज़गी पनप गई है।
सदन के भीतर बगावती तेवर सूत्रों का कहना है कि उपेक्षित वरिष्ठ विधायक अब सदन के भीतर ही सरकार को कठघरे में खड़ा करने की तैयारी कर रहे हैं।
सरकारी योजनाओं की जमीन पर धीमी रफ्तार, किसानों को खाद–बीज वितरण में गड़बड़ी, और नौकरशाही की बढ़ती हावी भूमिका जैसे मुद्दों पर असहज सवाल उठ सकते हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह असंतोष यदि खुलकर सामने आया, तो विपक्ष की जगह सत्ता पक्ष के ही विधायक सरकार को घेरते नजर आएंगे।
कांग्रेस की निष्क्रियता दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी की रणनीति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
कांग्रेस फिलहाल केवल केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों पर हमला बोलकर अपनी विपक्षी भूमिका निभाने का दावा कर रही है, जबकि प्रदेश की जनता से जुड़े मुद्दों पर पार्टी की आवाज़ कमजोर पड़ रही है।
संगठनात्मक स्तर पर बिखराव, नेतृत्व की निष्क्रियता और दिल्ली हाईकमान पर अति-निर्भरता ने कांग्रेस की धार कुंद कर दी है। यही कारण है कि सत्ता पक्ष को कठघरे में खड़ा करने का अवसर कांग्रेस गंवा रही है।राजनीतिक हलकों में चर्चा राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जब विपक्ष सोया हुआ हो और सत्ता पक्ष के विधायक ही असंतोष में हों, तो सदन का हर सत्र भाजपा सरकार के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है।
जानकार मानते हैं कि इस हालात में मुख्यमंत्री को न केवल विपक्ष से बल्कि अपनी ही पार्टी के भीतर उठने वाली नाराज़गी से भी दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है।
आने वाले दिनों की तस्वीर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कांग्रेस ने अपना रुख नहीं बदला और भाजपा नेतृत्व ने नाराज़ विधायकों को साधने की पहल नहीं की, तो छत्तीसगढ़ की राजनीति आने वाले समय में अस्थिर और टकराव पूर्ण होती नजर आ सकती है।
इससे न केवल सरकार की छवि प्रभावित होगी बल्कि विपक्ष के लिए भी यह अवसर होगा कि वह नए सिरे से खुद को मजबूत कर सके।