तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/
छत्तीसगढ़ में मीडिया और सरकार के बीच संबंध तनावपूर्ण होते जा रहे हैं। समाचार पत्रों को मिलने वाले सरकारी विज्ञापनों में कटौती और नियमित साप्ताहिक अखबारों को जनसंपर्क विभाग से नियमितता प्रमाण पत्र न दिए जाने का मुद्दा अब बड़ा विवाद बन गया है। पत्रकारों और संपादकों का आरोप है कि इस पूरे मामले में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के मीडिया सलाहकार और जनसंपर्क आयुक्त दोनों ही जिम्मेदार हैं।
जानकारी के अनुसार, प्रदेश के अनेक छोटे-बड़े दैनिक और साप्ताहिक अखबार सरकार से मिलने वाले विज्ञापन और प्रमाण पत्र पर ही निर्भर रहते हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से विज्ञापनों में भेदभावपूर्ण कटौती और प्रमाण पत्रों के वितरण में ढिलाई के चलते मीडिया जगत में भारी असंतोष है। अखबार संचालकों का कहना है कि मीडिया सलाहकार मुख्यमंत्री के नाम पर फैसले कर रहे हैं, जबकि जनसंपर्क आयुक्त उन फैसलों को अमल में लाने में भूमिका निभा रहे हैं।पत्रकारों का आरोप है कि मीडिया सलाहकार वेतनभोगी पद पर रहते हुए पत्रकारों की समस्याओं से कटे हुए हैं और केवल अपने हित साधने में लगे हैं। वहीं, जनसंपर्क आयुक्त पर भी यह आरोप है कि वे नियमों को ताक पर रखकर चयनात्मक ढंग से अखबारों को लाभान्वित कर रहे हैं। इस वजह से कई छोटे और ग्रामीण क्षेत्रों के अखबारों की नियमितता खतरे में पड़ गई है।भाजपा नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की छवि पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। जनता तक सरकार की योजनाओं और संदेशों को पहुँचाने का सबसे बड़ा माध्यम अखबार ही हैं, लेकिन अगर यही माध्यम नाराज़ हो जाएं तो सरकार की नैया बीच मझधार में फँस सकती है। विपक्ष भी इस मुद्दे को हाथों-हाथ उठा रहा है और सवाल कर रहा है कि आखिर मुख्यमंत्री ने मीडिया प्रबंधन का पूरा जिम्मा केवल एक सलाहकार और जनसंपर्क आयुक्त के भरोसे क्यों छोड़ रखा है?अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय इस विवाद पर चुप्पी तोड़ते हैं या फिर मीडिया सलाहकार और जनसंपर्क आयुक्त को बचाने की कोशिश में अपनी ही साख को दांव पर लगाते हैं। सर्वव्यापी अपने आगामी अंकों में इस मुद्दे पर तह तक जाकर विस्तार पूर्वक समाचार प्रकाशित करेंगी।