संपादक के कलम से…*दारु ले जिनगी लहुलुहान, फेर सरकार बर बनत हे सोने के खान..!

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तरुण कौशिक/ संपादक सर्वव्यापी/

छत्तीसगढ़ मं आज एक अइसन हालात बन गे हे जिहां सरकार खुदे अपन नारा ले खुदे ला ठुकरावत दिखत हे। एके करव सरकार करोड़ों रुपिया नशा मुक्ति अभियान मं बहावत हे—जनता ला समझावत हे के दारु-बीडी-सिगरेट ले जिनगी बिगड़थे, परिवार बर्बाद होथे, जवान पीढ़ी बरबाद होवत हे।दूसरे करव वही सरकार दारु दुकान के ठेका खोलके हर महिना अरबों रुपिया कमा लेथे। अब सवाल ये उठथे—जे नशा जिनगी बर ‘जहर’ आय, वोला सरकार अपन नफा खातिर ‘अमृत’ कहिके बेचत हे काबर?गांव-गांव मं दारु दुकान खुल गे, फेर नशा मुक्ति शिविर लगाय जावत हे। एक तरफा पोस्टर लगावत हे—“दारु मना हे, घर बिगाड़थे।” अउ दुसरे तरफा खुदे सरकारी दारु दुकान ले बिला नागा बोतल बेचत हे।इहीच तो हमर छत्तीसगढ़िया व्यंग्य आय, सरकार कहिथे कि दारु मत पीव, नुकसान होही। फेर अगो छापा मारे मं मिलथे—खुदे के सरकारी ठेका दुकान ले खरीदीच बोटल!येला काबर न समझा जावय? जनता बर समझावत हे अउ नफा बर कमावत हे। जेन सरकार हिम्मत देखावत हे, वो सरकार बनेच बनही जे दिन दारु अउ हर नशीला चीज ला पूरा बंद कर देही। फेर हिम्मत रहिस त ओ दिन कब आय?


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